शहीदों की क्रांतिकारी विरासत पर बुलडोजर का प्रहार: इंकलाबी मज़दूर केंद्र ने शाहजहांपुर की घटना पर जताई तीखी प्रतिक्रिया।

शाहजहांपुर/नई दिल्ली: २३ मार्च २०२६ को पूरा देश जब महान स्वतंत्रता सेनानी भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के शहादत दिवस पर उन्हें नमन कर रहा था, ठीक उसी रात उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में प्रशासन द्वारा एक ऐसी शर्मनाक कार्रवाई को अंजाम दिया गया जिसने जनवादी ताकतों को झकझोर कर रख दिया है। शाहजहांपुर नगर निगम के पास वर्ष १९७२ से स्थापित अमर शहीद अशफाकउल्ला खान, पंडित रामप्रसाद बिस्मिल और ठाकुर रोशन सिंह की त्रिमूर्ति प्रतिमा को देर रात बुलडोजर से ढहा दिया गया। इस घटना पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए ‘इंकलाबी मज़दूर केंद्र’ ने एक प्रेस नोट जारी कर इस कृत्य की कड़ी भर्त्सना की है।

रात के अंधेरे में कायराना कार्रवाई: इंकलाबी मज़दूर केंद्र

इंकलाबी मज़दूर केंद्र द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, यह घटना मात्र एक प्रशासनिक अतिक्रमण विरोधी अभियान नहीं है, बल्कि देश के गौरवशाली इतिहास पर सुनियोजित हमला है। संगठन ने आरोप लगाया कि सौंदर्यीकरण के नाम पर रात के ठीक ३ बजे इन अमर शहीदों की प्रतिमाओं को बुलडोजर से तोड़ा गया और अत्यंत अपमानजनक तरीके से उनके अवशेषों को डंपिंग यार्ड (कूड़ा घर) में फेंक दिया गया।

​प्रेस नोट में संगठन ने सवाल उठाया है कि यदि किसी विकास कार्य या सड़क चौड़ीकरण के लिए प्रतिमा को हटाना अनिवार्य ही था, तो इसे पूरे सम्मान के साथ विस्थापित क्यों नहीं किया गया? रात के अंधेरे में चोरी-छिपे इस #ShahjahanpurDemolition को अंजाम देना प्रशासन की नीयत पर गंभीर सवाल खड़े करता है। संगठन का स्पष्ट कहना है कि जिन विचारधाराओं का आजादी के आंदोलन में मुखबिरी करने का इतिहास रहा है, वे देश के सच्चे शहीदों के प्रति सम्मान की भाषा नहीं समझ सकते।

काकोरी के नायकों की ‘साझी शहादत’ पर चोट

विज्ञप्ति के माध्यम से संगठन ने याद दिलाया कि रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्ला खान और रोशन सिंह काकोरी ट्रेन एक्शन के वो महानायक थे जिन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य की चूलें हिला दी थीं। इस ऐतिहासिक घटना के बाद अंग्रेजों ने १९२७ में इन तीनों वीरों को फांसी के फंदे पर लटका दिया था। विशेष रूप से बिस्मिल और अशफाक की मित्रता भारत में हिंदू-मुस्लिम एकता और #SajhaItihas की सबसे बड़ी मिसाल है।

​इंकलाबी मज़दूर केंद्र का मानना है कि वर्तमान सत्ता जिस फासीवादी और विभाजनकारी एजेंडे को समाज में थोपना चाहती है, उसके लिए इन अमर शहीदों के धर्मनिरपेक्ष और साम्राज्य-विरोधी विचार सबसे बड़ी रुकावट हैं। यही कारण है कि सत्ता के संरक्षण में इन ऐतिहासिक प्रतीकों को मिटाने का प्रयास किया जा रहा है ताकि जनता के जेहन से इस साझी विरासत को मिटाया जा सके।

जनता के बढ़ते प्रतिरोध की चेतावनी

प्रेस नोट के अंत में इंकलाबी मज़दूर केंद्र ने सचेत किया है कि इतिहास गवाह है कि जब-जब सत्ता के अहंकार में इतिहास और शहीदों की स्मृतियों को कुचलने का प्रयास हुआ है, जनता की क्रांतिकारी चेतना और अधिक मजबूत होकर उभरी है। अल्पसंख्यक विरोधी और सांप्रदायिक घृणा फैलाने वाली नीतियों के खिलाफ आम अवाम का गुस्सा और प्रतिरोध अब और अधिक प्रखर होगा।

​मजदूर संगठन ने देश के तमाम इंसाफपसंद नागरिकों, बुद्धिजीवियों, मजदूरों और युवाओं से इस ऐतिहासिक अन्याय के खिलाफ एकजुट होकर आवाज उठाने की अपील की है। संगठन ने मांग की है कि शहीदों का अपमान करने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई हो और प्रतिमाओं को पूरे राजकीय सम्मान के साथ पुनः स्थापित किया जाए।

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