देहरादून मैक्स हॉस्पिटल के डॉक्टरों ने रचा इतिहास: सांस की नली में गंभीर रुकावट से जूझ रहे 2 महीने के मासूम को दिया जीवनदान

देहरादून।उत्तराखंड की राजधानी देहरादून स्थित मैक्स सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल के डॉक्टरों ने एक बार फिर अपनी चिकित्सकीय उत्कृष्टता का लोहा मनवाया है। एक अत्यंत दुर्लभ और जटिल चिकित्सकीय मामले में अस्पताल के विशेषज्ञों ने मात्र 2 महीने के एक शिशु की जान बचाने में सफलता हासिल की है, जो जन्म के समय से ही सांस की नली में गंभीर रुकावट (Airway Obstruction) की समस्या से जूझ रहा था। चिकित्सा जगत में इस तरह के ऑपरेशन को बेहद चुनौतीपूर्ण माना जाता है, विशेषकर जब मरीज की उम्र इतनी कम हो।

जन्म के साथ ही शुरू हुआ संघर्ष

​सहारनपुर के रहने वाले इस शिशु का संघर्ष जन्म के तुरंत बाद ही शुरू हो गया था। जन्म के समय ही उसे ‘न्यूमोथोरैक्स’ यानी छाती में हवा के रिसाव जैसी जानलेवा स्थिति का सामना करना पड़ा। इसके चलते उसे तत्काल इंट्यूबेशन और एडवांस्ड वेंटिलेटरी सपोर्ट पर रखना पड़ा। एक निजी अस्पताल में करीब एक महीने तक चले उपचार के बाद भी जब सुधार नहीं दिखा, तो परिजन बेहतर इलाज और पीडियाट्रिक एक्सपर्ट केयर की उम्मीद में उसे देहरादून के मैक्स सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल लेकर आए।

मैक्स हॉस्पिटल में विशेषज्ञों की मुस्तैदी

​जब बच्ची को अस्पताल लाया गया, तो उसकी हालत अत्यंत नाजुक थी। उसे बार-बार निमोनिया हो रहा था और शरीर में सेप्टिक शॉक के लक्षण भी थे। मामले की गंभीरता को देखते हुए अस्पताल के पीडियाट्रिक सर्जरी विभाग के विशेषज्ञों की एक मल्टीडिसिप्लिनरी टीम गठित की गई। इस टीम में रोहित श्रीवास्तव (प्रिंसिपल कंसल्टेंट – पीडियाट्रिक्स), वैभव चाचरा (प्रिंसिपल कंसल्टेंट – पल्मोनोलॉजी) और इरम खान (सीनियर कंसल्टेंट – ENT) शामिल थे।

सटीक जांच और अत्याधुनिक तकनीक का प्रयोग

​डॉक्टरों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि बच्ची को वेंटिलेटर सपोर्ट से हटाते ही उसकी हालत बिगड़ जाती थी। विस्तृत जांच और नियोनेटल ब्रोंकोस्कोपी के माध्यम से यह पता चला कि उसके वॉयस बॉक्स (लैरिनक्स) में गंभीर सूजन (एडिमा) है और वहां एक ‘सिस्ट’ विकसित हो गया है। यही सिस्ट उसके सांस की नली में गंभीर रुकावट पैदा कर रहा था।

​इस जटिल गांठ को हटाने के लिए डॉक्टरों ने आधुनिक कोब्लेशन तकनीक (Coblation Technique) का सहारा लिया। इस तकनीक की विशेषता यह है कि इसमें ऊतकों (Tissues) को न्यूनतम नुकसान पहुँचाते हुए सिस्ट को पूरी सटीकता के साथ निकाला जा सकता है। एक नवजात शिशु के मामले में, जहां श्वासनली का आकार महज कुछ मिलीमीटर होता है, वहां यह ऑपरेशन किसी चमत्कार से कम नहीं था।

चिकित्सकों का अनुभव और टीम वर्क

​इस दुर्लभ चिकित्सा मामले पर जानकारी देते हुए रोहित श्रीवास्तव ने बताया कि बच्चे का क्लिनिकल कोर्स काफी चुनौतीपूर्ण था। उसे न केवल सांस की समस्या थी, बल्कि बार-बार होने वाले निमोनिया ने उसकी प्रतिरोधक क्षमता को भी कमजोर कर दिया था। निरंतर निगरानी और सही समय पर एंटीबायोटिक्स व सपोर्टिव केयर देने से उसे स्थिर करना संभव हो सका।

​वहीं, ईएनटी विशेषज्ञ इरम खान ने बताया कि छोटे बच्चों में एयरवे मैनेजमेंट करना तकनीकी रूप से बहुत कठिन होता है। कार्य करने की जगह (Surgical Space) बहुत कम होने के कारण बहुत अधिक सटीकता और नियंत्रण की आवश्यकता थी। एपिग्लॉटिस से निकलने वाले सिस्ट को सुरक्षित रूप से हटाना ही इस सफलता की कुंजी रही। पल्मोनोलॉजी विशेषज्ञ वैभव चाचरा के अनुसार, केवल वेंटिलेटर सपोर्ट इस समस्या का समाधान नहीं था, बल्कि सांस की नली में रुकावट के वास्तविक कारण को पहचानना और उसे दूर करना आवश्यक था।

क्षेत्र में चिकित्सा के नए मानक

देहरादून मैक्स हॉस्पिटल द्वारा किए गए इस सफल उपचार ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि राज्य में अब वैश्विक स्तर की चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध हैं। श्वासनली का सफल ऑपरेशन होने के बाद बच्चा अब पूरी तरह स्वस्थ है और सुरक्षित रूप से सांस ले पा रहा है। अत्याधुनिक कोब्लेशन तकनीक और विशेषज्ञों के सामूहिक प्रयास ने एक मासूम को नई जिंदगी दी है, जिससे उसके परिवार में खुशी की लहर है।

​यह मामला न केवल चिकित्सा विज्ञान की सफलता है, बल्कि उन अभिभावकों के लिए एक उम्मीद की किरण भी है जिनके बच्चे जन्मजात जटिल बीमारियों से जूझ रहे हैं। देहरादून मैक्स हॉस्पिटल में उपलब्ध यह पीडियाट्रिक एक्सपर्ट केयर आज के समय में इस पूरे क्षेत्र के लिए एक वरदान साबित हो रही है।

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