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मजदूरों का हुंकार: ₹15,200 की ‘भुखमरी मजदूरी’ नामंजूर, ₹30,000 न्यूनतम वेतन और ठेका प्रथा के खात्मे तक जारी रहेगा संघर्ष


गुरुग्राम/मानेसर |हरियाणा के औद्योगिक गलियारों से उठी मजदूरों के हक की आवाज अब एक राष्ट्रव्यापी आंदोलन की शक्ल ले चुकी है। मजदूर अधिकार संघर्ष अभियान ने हरियाणा सहित देशभर के औद्योगिक क्षेत्रों में जारी मजदूरों के संघर्ष के प्रति अपनी अटूट एकजुटता प्रकट करते हुए केंद्र और राज्य सरकारों को सीधी चेतावनी दी है। अभियान ने स्पष्ट किया है कि जब तक न्यूनतम वेतन ₹30,000 नहीं किया जाता और ठेका प्रथा का पूर्ण उन्मूलन नहीं होता, तब तक यह न्यायसंगत लड़ाई थमेगी नहीं।

महज ‘भुखमरी मजदूरी’ है ₹15,200 की घोषणा

बीते 8 अप्रैल को हरियाणा सरकार द्वारा न्यूनतम वेतन में की गई लगभग 35 प्रतिशत की वृद्धि को मजदूरों ने सिरे से खारिज कर दिया है। सरकार ने इसे ₹15,200 तय किया है, जिसे मजदूर संगठनों ने ‘क्रूर मजाक’ और ‘भुखमरी मजदूरी’ करार दिया है। संगठन का तर्क है कि आज के दौर में बढ़ती महंगाई, आसमान छूते मकान किराए, बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य खर्चों के बीच यह राशि किसी भी परिवार के लिए सम्मानजनक जीवन जीने के लिए पर्याप्त नहीं है। 1957 के श्रम सम्मेलन के मानकों को आधार मानें तो आज न्यूनतम वेतन ₹30,000 होना एक कानूनी और नैतिक अधिकार है, कोई खैरात नहीं।

शोषण का गढ़ बनते औद्योगिक क्षेत्र

गुड़गांव-मानेसर, पानीपत और धारूहेड़ा जैसे औद्योगिक क्षेत्रों में होंडा, मुंजाल शोवा, सत्यम, और ऋचा ग्लोबल जैसी दिग्गज कंपनियों के हजारों श्रमिक आज सड़कों पर हैं। इन कारखानों में 8 घंटे के कार्यदिवस के अंतरराष्ट्रीय नियम की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। मजदूरों से 10 से 14 घंटे तक काम लिया जा रहा है, लेकिन Double Overtime (दोगुनी दर पर ओवरटाइम भुगतान) का कहीं नामोनिशान नहीं है। मजदूर अधिकार संघर्ष अभियान ने आरोप लगाया कि प्रशासन और श्रम विभाग ने अपनी आंखें मूंद रखी हैं, जिससे प्रबंधन को मजदूरों की मेहनत की खुली लूट करने की छूट मिल गई है।

ठेका प्रथा: गुलामी का आधुनिक स्वरूप

आंदोलन का सबसे प्रखर स्वर ठेका प्रथा के विरुद्ध उठ रहा है। संगठन का मानना है कि जब कार्य की प्रकृति स्थायी है, तो रोजगार भी स्थायी होना चाहिए। आज कारखानों में वर्षों तक पसीना बहाने वाले मजदूरों को ठेके पर रखकर उन्हें पीएफ, ईएसआई और नौकरी की सुरक्षा जैसे बुनियादी अधिकारों से वंचित रखा जा रहा है। यह व्यवस्था न केवल मजदूरों को कमजोर करती है, बल्कि उन्हें संगठित होने से भी रोकती है। End Contract System की मांग अब इस आंदोलन का मुख्य केंद्र बिंदु बन गई है।

पुलिसिया दमन और तानाशाही का दौर

9 अप्रैल 2026 को मानेसर में शांतिपूर्ण हड़ताल कर रहे श्रमिकों पर पुलिसिया लाठीचार्ज और कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी ने सरकार के दमनकारी चेहरे को उजागर कर दिया है। ऋचा एक्सपोर्ट और मॉडलेमा जैसी कंपनियों में मजदूरों को जबरन फैक्ट्री के भीतर बंद कर काम कराने की कोशिशों ने लोकतांत्रिक मर्यादाओं को तार-तार कर दिया है। श्रम मंत्री और प्रशासन द्वारा मजदूरों की मांगों को सुनने के बजाय उनके प्रतिनिधियों को रात के अंधेरे में हिरासत में लेना आंदोलन को कुचलने की एक नाकाम कोशिश है।

निष्कर्ष: यह अंत नहीं, एक नई शुरुआत है

मजदूर अधिकार संघर्ष अभियान ने इस आंशिक वेतन वृद्धि को अपनी पहली जीत मानते हुए आगाह किया है कि यह केवल एक पड़ाव है, मंजिल नहीं। यह स्वतःस्फूर्त आंदोलन अब रुकने वाला नहीं है। संगठन ने देशभर के जनपक्षधर ताकतों, नागरिक समाज और अन्य संगठनों से आह्वान किया है कि वे इस Labor Struggle में शामिल हों।

​यह लड़ाई सिर्फ मजदूरी बढ़ाने की नहीं, बल्कि एक मजदूर के आत्मसम्मान, कानूनी अधिकार और शोषण मुक्त कार्यस्थल की है। जब तक न्यूनतम वेतन ₹30,000, 8 घंटे कार्यदिवस और स्थायी रोजगार की मांगें पूरी नहीं होतीं, ‘मजदूर एकता जिंदाबाद’ का नारा औद्योगिक क्षेत्रों की फिजाओं में गूंजता रहेगा।

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