देहरादून: हिमालयी राज्य उत्तराखण्ड आज विकास और जन-संवेदना के एक नए युग का साक्षी बन रहा है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में पिछले चार वर्षों का कार्यकाल केवल आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि सेवा सम्मान और सशक्तिकरण की एक ऐसी गाथा है, जिसने समाज के हर वर्ग के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाया है। उत्तराखण्ड का कायाकल्प करने के ध्येय से सरकार ने आंदोलनकारियों, सैनिकों और आम नागरिकों के लिए जो निर्णय लिए हैं, वे मील का पत्थर साबित हो रहे हैं।
आंदोलनकारियों और सैनिकों को मिला ऐतिहासिक अधिकार
राज्य निर्माण की नींव रखने वाले आंदोलनकारियों के बलिदान को पहचान देते हुए सरकार ने उन्हें सरकारी नौकरियों में 10 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण प्रदान किया है। यह आंदोलनकारी आरक्षण न केवल एक नीतिगत फैसला है, बल्कि उन संघर्षों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का तरीका है। इसके साथ ही, उनके आश्रितों की पेंशन को ₹3000 से बढ़ाकर ₹5500 कर दिया गया है। जेल जाने वाले और घायल आंदोलनकारियों की पेंशन में भी उल्लेखनीय वृद्धि करते हुए इसे ₹7000 प्रतिमाह किया गया है।
वहीं, सैनिक कल्याण के क्षेत्र में सरकार ने अभूतपूर्व संवेदनशीलता दिखाई है। सीमाओं की रक्षा करते हुए अपना सर्वोच्च बलिदान देने वाले शहीद सैनिकों के परिवारों के लिए अनुग्रह राशि को ₹10 लाख से सीधा पांच गुना बढ़ाकर ₹50 लाख कर दिया गया है। अदम्य साहस का परिचय देने वाले परमवीर चक्र विजेताओं के लिए यह राशि ₹50 लाख से बढ़ाकर ₹1.5 करोड़ कर दी गई है। इसके अतिरिक्त, ‘अग्निवीर’ योजना के तहत सेवा देने वाले युवाओं के भविष्य को सुरक्षित करते हुए उन्हें राज्य की सरकारी नौकरियों में 10 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण देने का निर्णय सशक्तिकरण की दिशा में एक साहसिक कदम है।
जनसेवा संकल्प: सरकार आपके द्वार
प्रशासनिक गलियारों से निकलकर शासन अब जनता के आंगन तक पहुँचा है। जनसेवा संकल्प के तहत “जन-जन की सरकार, जन-जन के द्वार” पहल ने लोक कल्याण के नए मानक स्थापित किए हैं। प्रदेशभर में आयोजित 686 शिविरों में 5 लाख से अधिक लोगों की सहभागिता यह सिद्ध करती है कि जनता का विश्वास व्यवस्था पर बढ़ा है। इन शिविरों के माध्यम से लाखों नागरिकों को मौके पर ही सरकारी योजनाओं का लाभ मिला और हजारों शिकायतों का त्वरित निस्तारण किया गया, जो सुशासन की असली पहचान है।
डिजिटल इंडिया के विजन को आगे बढ़ाते हुए ‘अपुणि सरकार’ पोर्टल के माध्यम से करीब 950 सेवाओं को ऑनलाइन कर दिया गया है। आज उत्तराखण्ड का नागरिक अपनी जरूरतों के लिए दफ्तरों के चक्कर काटने के बजाय तकनीक के माध्यम से घर बैठे लाभ ले रहा है। यह डिजिटल सशक्तिकरण भ्रष्टाचार पर चोट करने और पारदर्शिता लाने का सबसे प्रभावी जरिया बना है।
सामाजिक सुरक्षा और समावेशी विकास
समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति की चिंता करना ही इस सरकार की प्राथमिकता रही है। वृद्धजनों के लिए पेंशन की राशि बढ़ाकर ₹1500 की गई है, जिससे अब बुजुर्ग दंपत्ति ससम्मान अपना जीवन यापन कर पा रहे हैं। इतना ही नहीं, कला और साहित्य के क्षेत्र में अपना जीवन समर्पित करने वाले आर्थिक रूप से कमजोर कलाकारों और लेखकों की मासिक पेंशन को भी दोगुना कर ₹6000 कर दिया गया है। यह निर्णय सांस्कृतिक सेवा सम्मान का परिचायक है।
सुशासन से सशक्त उत्तराखण्ड
विगत चार वर्षों के ये ऐतिहासिक निर्णय इस बात का प्रमाण हैं कि सरकार की नियत और नीति, दोनों ही स्पष्ट हैं। उत्तराखण्ड का कायाकल्प करने के लिए लिए गए ये फैसले राज्य को एक सशक्त और संवेदनशील प्रदेश के रूप में स्थापित कर रहे हैं। आंदोलनकारी आरक्षण से लेकर सैनिक कल्याण तक और डिजिटल सेवाओं से लेकर सामाजिक सुरक्षा तक, हर कदम सुशासन की ओर बढ़ता हुआ एक मजबूत कदम है। राज्य सरकार का यह संकल्प “सेवा, सम्मान और सुशासन” के मूल मंत्र के साथ आने वाले समय में उत्तराखण्ड को देश के अग्रणी राज्यों की पंक्ति में खड़ा करने के लिए पूरी तरह तैयार है।
