रामनगर (उत्तराखंड): राज्य परिवहन प्राधिकरण द्वारा स्कूल बसों और वैन के किराये में की गई भारी वृद्धि ने अभिभावकों की कमर तोड़ दी है। इस निर्णय के खिलाफ अब कानूनी विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मोर्चा खोल दिया है। रामनगर परामर्श विधि परिवार ने इस आदेश को ‘जनविरोधी’ और ‘मनमाना’ करार देते हुए इसके खिलाफ विधिक और प्रशासनिक लड़ाई लड़ने का ऐलान किया है।
क्या है पूरा मामला?
हाल ही में राज्य परिवहन प्राधिकरण, उत्तराखंड ने प्रदेश में संचालित स्कूल बसों और स्कूल वैन के लिए नया किराया चार्ट जारी किया है। इस आदेश के तहत 1 से 10 किलोमीटर की दूरी के लिए न्यूनतम 2200 रुपये प्रति छात्र परिवहन शुल्क निर्धारित किया गया है। प्राधिकरण का दावा है कि यह निर्णय एक विशेषज्ञ समिति की संस्तुति पर आधारित है, लेकिन धरातल पर यह आदेश मध्यमवर्गीय और गरीब परिवारों के लिए एक बड़ा आर्थिक झटका साबित हो रहा है।
विधि विशेषज्ञों की गंभीर आपत्ति
इस निर्णय पर कड़ा एतराज जताते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता पूरन पांडे ने कहा कि 10 किलोमीटर तक के सफर के लिए 2200 रुपये का शुल्क पूरी तरह से अव्यवहारिक है। उन्होंने तर्क दिया कि किसी भी सार्वजनिक नीति के निर्धारण से पहले ‘प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों’ का पालन किया जाना अनिवार्य है। बिना व्यापक जनसुनवाई और मुख्य हितधारकों (अभिभावकों) से चर्चा किए बिना थोपा गया यह शुल्क पूरी तरह से एकतरफा है।
वहीं, हाईकोर्ट अधिवक्ता मनु अग्रवाल ने इस मुद्दे के संवैधानिक पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए कहा, “शिक्षा प्राप्त करना बच्चों का मौलिक अधिकार है और इस प्रकार की भारी किराया वृद्धि अप्रत्यक्ष रूप से शिक्षा की राह में बाधा उत्पन्न करती है। यह निर्णय समानता और न्यायसंगत व्यवहार के संवैधानिक अधिकारों का स्पष्ट उल्लंघन प्रतीत होता है। प्राधिकरण को इस पर तत्काल पुनर्विचार करना चाहिए।”
अभिभावक संघ का होगा गठन
रामनगर परामर्श विधि परिवार ने केवल विरोध तक ही सीमित न रहने का फैसला किया है। संगठन ने घोषणा की है कि जल्द ही एक सशक्त अभिभावक संघ का गठन किया जाएगा। इस संघ के माध्यम से शासन-प्रशासन और परिवहन प्राधिकरण के समक्ष कानूनी तथ्यों के साथ पक्ष रखा जाएगा। यदि आवश्यकता पड़ी, तो इस विसंगतिपूर्ण आदेश को न्यायालय में भी चुनौती दी जाएगी ताकि आमजन पर पड़ने वाले इस अनावश्यक आर्थिक बोझ को कम किया जा सके।
बढ़ता आक्रोश और एकजुटता
इस अभियान को व्यापक जनसमर्थन मिल रहा है। विरोध दर्ज कराने वालों में अधिवक्ता मनोज बिष्ट, फ़िरोज़ अंसारी, भूपाल रावत और गौरब गोला प्रमुख रूप से शामिल रहे। इन सभी का एकसुर में कहना है कि स्कूल बसों का संचालन कोई व्यावसायिक लाभ का साधन मात्र नहीं होना चाहिए, बल्कि इसमें सेवा भाव और अभिभावकों की आर्थिक क्षमता का भी ध्यान रखा जाना चाहिए।
क्षेत्र के अभिभावकों में भी इस आदेश को लेकर भारी रोष है। लोगों का कहना है कि पहले से ही महंगाई की मार झेल रहे परिवारों के लिए हर महीने स्कूल बस के नाम पर इतनी बड़ी राशि चुकाना नामुमकिन है। School Bus Fare Hike के खिलाफ उठ रही यह आवाज अब एक बड़े आंदोलन का रूप लेती दिखाई दे रही है।
