हरिद्वार। उत्तराखंड के औद्योगिक केंद्र सिडकुल (हरिद्वार) में इन दिनों भारी तनाव का माहौल है। देश के विभिन्न हिस्सों में मज़दूरों के बढ़ते आक्रोश और आंदोलनों के बाद उत्तराखंड सरकार ने न्यूनतम वेतन में वृद्धि की घोषणा तो की, लेकिन धरातल पर इसे लागू करवाने में शासन पूरी तरह विफल नजर आ रहा है। मज़दूरों का आरोप है कि फैक्ट्री मालिक न तो बढ़े हुए वेतन को लागू कर रहे हैं और न ही श्रम कानूनों का पालन कर रहे हैं। इस हक की लड़ाई में जब मज़दूर सड़कों पर उतरे, तो उनके खिलाफ ‘दमन’ का चक्र शुरू कर दिया गया है।
श्रम कानूनों का खुला उल्लंघन और फैक्ट्री मालिकों की मनमानी
सिडकुल हरिद्वार की दिग्गज कंपनियों, कैंपस एक्टिवेयर और हैमिल्टन के मज़दूरों ने गंभीर आरोप लगाए हैं। मज़दूरों के अनुसार, अधिकांश फैक्ट्रियों में 12-12 घंटे की शिफ्ट चलाई जा रही है और साप्ताहिक अवकाश तक नहीं दिया जा रहा। चौंकाने वाली बात यह है कि मज़दूरों से 30 दिन लगातार काम लिया जा रहा है, जो कि श्रम कानूनों के तहत एक दंडनीय अपराध है। इसके अलावा, एक ही मज़दूर से दो या तीन मशीनें चलवाकर उनका शारीरिक और मानसिक शोषण किया जा रहा है।
मज़दूरों की मुख्य मांगें:
- बढ़ुआ न्यूनतम वेतन तत्काल प्रभाव से लागू किया जाए।
- ओवरटाइम का कानूनन दोगुना भुगतान सुनिश्चित हो।
- मज़दूरों और मज़दूर नेताओं पर दर्ज सभी फर्जी मुकदमे तुरंत वापस लिए जाएं।
- एक मज़दूर से एक से अधिक मशीन चलवाने की शोषणकारी प्रथा बंद हो।
प्रशासन और पूंजीपतियों का ‘गठजोड़’
इंकलाबी मज़दूर केन्द्र के पदाधिकारियों का कहना है कि जब मज़दूरों ने 8 और 9 मई को सामूहिक रूप से श्रम विभाग पहुंचकर अपनी मांगें रखीं, तो वहां प्रशासन की मौजूदगी में समझौता हुआ। इस समझौते में इंकलाबी मज़दूर केन्द्र के उपाध्यक्ष पंकज बवाड़ी भी शामिल थे। मज़दूरों का कहना है कि वार्ता के दौरान अधिकारियों ने भी स्वीकार किया कि कंपनी प्रबंधन ने श्रम कानूनों का उल्लंघन किया है। लेकिन इसके बावजूद, न्याय करने के बजाय पुलिस प्रशासन ने मज़दूर नेताओं और सक्रिय कार्यकर्ताओं को ही निशाना बनाना शुरू कर दिया है।
मज़दूर नेताओं पर फर्जी मुकदमे: दमन की नीति
आंदोलन को दबाने के लिए पुलिस ने इंकलाबी मज़दूर केन्द्र के उपाध्यक्ष पंकज बवाड़ी, जय प्रकाश और प्रगतिशील महिला एकता केंद्र की उपाध्यक्ष नीता समेत करीब 22 मज़दूरों पर मुकदमे दर्ज किए हैं। मज़दूर संगठनों का सीधा आरोप है कि यह सब उत्तराखंड सरकार के इशारे पर किया जा रहा है ताकि पूंजीपतियों के मुनाफे को सुरक्षित रखा जा सके और मज़दूरों की जायज आवाज को खामोश कर दिया जाए।
उत्तराखंड सरकार सीधे तौर पर पूंजीपतियों के पक्ष में खड़ी दिखाई दे रही है। नियमों का पालन करवाने के बजाय उन लोगों को अपराधी बनाया जा रहा है जो कानून के दायरे में रहकर अपने अधिकारों की मांग कर रहे हैं।
आगे की राह: ‘फौलादी एकता’ से मिलेगा हक
इंकलाबी मज़दूर केन्द्र ने सरकार की इन दमनकारी नीतियों की कड़ी निंदा की है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि मज़दूर वर्ग इस उत्पीड़न का जवाब अपनी एकजुटता से देगा। संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही फर्जी मुकदमे वापस नहीं लिए गए और श्रम कानूनों को कड़ाई से लागू नहीं किया गया, तो यह आंदोलन और अधिक उग्र रूप धारण करेगा।
वर्तमान स्थिति यह सवाल खड़ा करती है कि क्या प्रशासन और शासन केवल रसूखदारों के लिए है? सिडकुल का मज़दूर आज खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है, जहाँ उसे अपने पसीने की कमाई और कानून सम्मत अधिकारों के लिए भी जेल जाने की धमकी दी जा रही है।
