देहरादून: उत्तराखंड में ऊर्जा और रसोई गैस प्रबंधन की नई अग्निपरीक्षा
देहरादून।देवभूमि उत्तराखंड में वर्तमान में एलपीजी गैस सिलेंडरों की आपूर्ति और वितरण प्रणाली एक संवेदनशील मोड़ पर खड़ी है। अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीतिक उथल-पुथल और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में आए व्यवधानों के मद्देनजर, उत्तराखंड सरकार और राज्य प्रशासन ने भविष्य की किसी भी ‘अफरातफरी’ को रोकने के लिए कमर कस ली है। शासन का प्राथमिक उद्देश्य राज्य में LPG Gas Cylinder Distribution को सुव्यवस्थित करना और जमाखोरी जैसी प्रवृत्तियों पर अंकुश लगाना है।
व्यावसायिक आपूर्ति पर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’: 80 प्रतिशत की कटौती
राज्य सरकार ने एक अत्यंत कड़ा लेकिन रणनीतिक निर्णय लेते हुए व्यावसायिक (Commercial) गैस सिलेंडरों की आपूर्ति को तत्काल प्रभाव से सीमित कर दिया है। आंकड़ों के अनुसार, उत्तराखंड में प्रतिमाह लगभग 1,72,000 व्यावसायिक सिलेंडरों की खपत होती है। हालांकि, मौजूदा Energy Crisis Management के तहत अब केवल 20 प्रतिशत आपूर्ति ही सुनिश्चित की जाएगी। इसका सीधा अर्थ यह है कि अब बाजार में केवल 34,400 सिलेंडर ही उपलब्ध होंगे।
इस नई व्यवस्था के अंतर्गत, संपूर्ण राज्य के होटलों, ढाबों और रेस्टोरेंट्स के लिए प्रतिदिन मात्र 1,400 सिलेंडरों का कोटा निर्धारित किया गया है। हालांकि, प्रशासन ने दूरदर्शिता दिखाते हुए गैस कंपनियों को 2,650 सिलेंडरों का बफर स्टॉक बनाए रखने के निर्देश दिए हैं ताकि किसी भी आपातकालीन स्थिति (Emergency Supply) में बाजार की मांग को तत्काल पूरा किया जा सके।
वितरण के कड़े नियम और प्राथमिकताएं
प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि Commercial LPG Supply का वितरण अब ‘अंधाधुंध’ नहीं होगा। केवल उन्हीं प्रतिष्ठानों को प्राथमिकता दी जाएगी जो आधिकारिक रूप से पंजीकृत हैं और जिनका ट्रैक रिकॉर्ड नियमित रहा है। इस कदम से न केवल फर्जी मांग पर लगाम लगेगी, बल्कि ‘ब्लैक मार्केटिंग’ की संभावनाओं को भी जड़ से खत्म किया जा सकेगा। राहत की बात यह है कि इस कटौती से अस्पतालों और शिक्षण संस्थानों को मुक्त रखा गया है। सामाजिक सरोकारों को सर्वोपरि रखते हुए इन क्षेत्रों में 100% आपूर्ति जारी रहेगी।
घरेलू उपभोक्ताओं के लिए ‘बैकलॉग’ की चुनौती
जहाँ एक ओर व्यावसायिक क्षेत्र पाबंदियों से जूझ रहा है, वहीं घरेलू मोर्चे पर ‘बैकलॉग’ एक बड़ी समस्या बनकर उभरा है। वर्तमान में Domestic LPG Backlog का सबसे अधिक प्रभाव हल्द्वानी में देखा जा रहा है, जहाँ उपभोक्ताओं को अपने सिलेंडर के लिए औसतन 6.5 दिनों का इंतजार करना पड़ रहा है। सामान्यतः यह अवधि 1 से 2 दिन की होती है। कुमाऊं से लेकर गढ़वाल तक, राज्य के अन्य हिस्सों में भी लगभग 5 दिनों का वेटिंग पीरियड चल रहा है।
डिजिटल डेटा बनाम जमीनी हकीकत
जांच में यह रोचक तथ्य सामने आया है कि बैकलॉग के आंकड़े जितने गंभीर दिख रहे हैं, धरातल पर स्थिति उतनी विकट नहीं है। इसका मुख्य कारण ‘तकनीकी विसंगति’ है। हाल के दिनों में हजारों उपभोक्ताओं ने ऑनलाइन ऐप के बजाय मैन्युअल तरीके से बुकिंग कराई। गैस एजेंसियों ने सिलेंडर तो पहुंचा दिए, लेकिन लगभग 8,000 सिलेंडरों का डेटा डिजिटल पोर्टल पर अपडेट नहीं हो सका। यही कारण है कि सिस्टम में Uttarakhand LPG Status अभी भी लंबित दिखाई दे रहा है, जबकि वितरण प्रक्रिया जारी है।
सुधार की ओर बढ़ते कदम
अच्छी खबर यह है कि पैनिक बुकिंग में भारी गिरावट आई है। कुछ दिनों पहले तक जहाँ प्रतिदिन 54,985 सिलेंडरों की बुकिंग हो रही थी, वह अब घटकर 30,000 के करीब आ गई है। बुकिंग के इस दबाव में कमी आने से आपूर्ति तंत्र को सांस लेने की जगह मिली है। प्रशासन का दावा है कि अगले एक सप्ताह के भीतर वितरण चक्र पूरी तरह सामान्य हो जाएगा।
उत्तराखंड सरकार का यह ‘नियंत्रित वितरण मॉडल’ संसाधनों के बेहतर प्रबंधन का एक उदाहरण है। व्यावसायिक क्षेत्र पर अस्थायी अंकुश लगाकर घरेलू चूल्हों को जलते रहने की प्राथमिकता देना एक संतुलित कदम है। यदि उपभोक्ता धैर्य बनाए रखते हैं और केवल आवश्यकतानुसार बुकिंग करते हैं, तो राज्य जल्द ही इस ऊर्जा चुनौती से पार पा लेगा।
