👉 Live IPL Score 👇

';

साम्राज्यवादी युद्ध और दमनकारी नीतियों के विरुद्ध गूंजी ‘आधी आबादी’ की आवाज; उत्तराखंड में क्रांतिकारी जोश के साथ मना ‘अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस’


नैनीताल/रुद्रपुर/हरिद्वार/जसपुर (8 मार्च 2026): उत्तराखंड के विभिन्न नगरों और कस्बों में आज ‘अंतर्राष्ट्रीय कामगार महिला दिवस’ केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि सत्ता की जनविरोधी नीतियों और वैश्विक स्तर पर जारी साम्राज्यवादी युद्धों के खिलाफ एक सामूहिक गर्जना बनकर उभरा। प्रगतिशील महिला एकता केंद्र, इंकलाबी मजदूर केंद्र और प्रगतिशील भोजनमाता संगठन सहित विभिन्न जन-संगठनों ने रामनगर, रुद्रपुर, हरिद्वार, लालकुआं, हल्द्वानी, पंतनगर और जसपुर में विशाल सभाओं और जुलूसों के माध्यम से संघर्ष का बिगुल फूंका।

ईरान पर हमले के विरोध में दो मिनट का मौन: “युद्ध की सबसे बड़ी शिकार महिलाएं”

​कार्यक्रमों की शुरुआत एक भावुक क्षण से हुई। अमेरिका-इजरायल गठजोड़ द्वारा ईरान पर की जा रही बमबारी में मारे गए मासूम बच्चों और निर्दोष नागरिकों की स्मृति में दो मिनट का मौन रखकर श्रद्धांजलि अर्पित की गई। वक्ताओं ने तीखे शब्दों में कहा कि अमेरिका और इजरायल मानवता के अपराधी हैं। “तिनका-तिनका जोड़कर बसाए गए घर बमबारी में तबाह हो रहे हैं, और इसकी सबसे बड़ी गाज महिलाओं और बच्चों पर गिर रही है।” वक्ताओं ने ईरान को भारत का पारंपरिक मित्र बताते हुए इस संकट की घड़ी में केंद्र सरकार की ‘मौन सहमति’ पर कड़े सवाल उठाए।

जसपुर और हरिद्वार: “अधिकारों के लिए जुझारू विरासत की याद”

जसपुर के बीआरसी केंद्र और हरिद्वार के भेल बाल उद्यान में आयोजित सभाओं में वक्ताओं ने 8 मार्च के गौरवशाली इतिहास को याद किया। उन्होंने बताया कि यह दिन न्यूयॉर्क की महिला श्रमिकों द्वारा वोट के अधिकार, काम के घंटे कम करने और पुरुषों के समान वेतन की मांग के साथ जुड़ा है। वक्ताओं ने जोर देकर कहा कि “शासक वर्ग महिला दिवस मनाकर महिला मजदूरों के वास्तविक संघर्षों को गायब करना चाहता है, जिसे होने नहीं दिया जाएगा।”

लेबर कोड और बढ़ती हिंसा पर सरकार को घेरा

​हल्द्वानी से लेकर हरिद्वार तक की सभाओं में वक्ताओं ने मोदी सरकार द्वारा लाए गए ‘4 नए लेबर कोड’ को महिला मजदूरों के अधिकारों पर ‘डेथ वारंट’ करार दिया। मुख्य आरोप निम्नलिखित रहे:

  • रात्रि पाली का कानून: महिलाओं से रात 7 बजे से सुबह 6 बजे तक काम कराने की अनुमति देना उनकी सुरक्षा और स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ है।
  • बेगारी जैसा मानदेय: भोजनमाताओं, आशा और आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों को न्यूनतम वेतन न देकर केवल मामूली ‘मानदेय’ देना आधुनिक युग की बेगारी है।
  • काम के घंटे: 8 घंटे के कार्य दिवस को बढ़ाकर 12 घंटे करने का पुरजोर विरोध किया गया।
  • बढ़ती असुरक्षा: अंकिता भंडारी हत्याकांड का जिक्र करते हुए वक्ताओं ने कहा कि ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ का नारा देने वाली सरकार के राज में महिलाएं सबसे अधिक असुरक्षित हैं।

पतित संस्कृति और एपेस्टिन फाइल का खुलासा

​रुद्रपुर और लालकुआं की सभाओं में वक्ताओं ने उपभोक्तावादी संस्कृति पर कड़ा प्रहार किया। ‘एपेस्टिन फाइल’ के माध्यम से उजागर हुई वैश्विक गंदगी का हवाला देते हुए कहा गया कि पूंजीवाद ने महिलाओं को केवल एक ‘वस्तु’ (माल) के रूप में पेश किया है, जिससे यौन हिंसा और अपराधों का ग्राफ बढ़ा है।

बराबरी के लिए ‘समाजवाद’ ही एकमात्र विकल्प

​पंतनगर, बेतालघाट, देघाट और काशीपुर के कार्यक्रमों में एक सुर में यह आह्वान किया गया कि महिलाओं की पूर्ण मुक्ति केवल समाजवादी व्यवस्था में ही संभव है, जहाँ मुनाफे की जगह मानवता को प्राथमिकता दी जाती है। संगठनों ने संकल्प लिया कि वे पूंजीवादी व्यवस्था के खात्मे और एक न्यायपूर्ण समाज के निर्माण तक अपना संघर्ष जारी रखेंगे।

प्रमुख भागीदारी: इन कार्यक्रमों में तुलसी छिंवाल, गीता आर्य, सुमन जोशी, शीला शर्मा (रामनगर), नीता, रजनी, पंकज कुमार (हरिद्वार), काजल, रेखा (लालकुआं), मनोज, अभिलाख (पंतनगर) और जसपुर, काशीपुर, चम्पावत सहित कई क्षेत्रों की भोजनमाताएं व श्रमिक संगठनों के प्रतिनिधि शामिल रहे।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *