हल्द्वानी/रामनगर :उत्तराखंड राज्य अपनी स्थापना के 25वें वर्ष में प्रवेश कर चुका है। जहाँ एक ओर सरकार उत्तराखंड रजत जयंती (Silver Jubilee) समारोहों के माध्यम से अपनी उपलब्धियों का गुणगान कर रही है, वहीं दूसरी ओर राज्य की नींव रखने वाले राज्य आंदोलनकारी (State Activists) आज भी उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। इसी कड़ी में आज राज्य आंदोलनकारियों के एक प्रतिनिधिमंडल ने जिलाधिकारी के हल्द्वानी स्थित कार्यालय में मुलाकात की और मुख्यमंत्री को संबोधित एक प्रखर ज्ञापन सौंपा।
शहादत की नींव और अनसुलझे सवाल
प्रतिनिधिमंडल ने जिलाधिकारी के माध्यम से सरकार को याद दिलाया कि यह पृथक उत्तराखंड राज्य खैरात में नहीं मिला है। इसके पीछे 42 से ज्यादा आंदोलनकारियों की शहादत, खटीमा-मसूरी-मुजफ्फरनगर के वीभत्स कांड और हजारों युवाओं व महिलाओं का दमन-उत्पीड़न शामिल है। भारी संघर्ष के बाद 9 नवंबर 2000 को अस्तित्व में आया यह राज्य आज अपने अस्तित्व के मूल उद्देश्यों से भटकता नजर आ रहा है।
आंदोलनकारियों ने स्पष्ट किया कि ‘पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी’ को बचाने के जिस संकल्प के साथ राज्य बना था, वह आज भी एक अधूरा सपना है। ज्ञापन में तीखे सवाल उठाते हुए पूछा गया कि आखिर 25 वर्षों बाद भी स्थाई राजधानी गैरसैंण, पलायन, और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर सरकारें मौन क्यों हैं?
ज्वलंत मुद्दे: मूल निवास और भू कानून
इस वार्ता के दौरान मूल निवास (Mool Niwas) और सख्त भू कानून (Bhu Kanoon) की मांग प्रमुखता से छाई रही। प्रतिनिधिमंडल ने कहा कि उत्तराखंड की अस्मिता को बचाने के लिए ये दोनों कानून संजीवनी के समान हैं, लेकिन सरकार इस दिशा में ठोस कदम उठाने के बजाय केवल रस्मी उत्सवों में व्यस्त है। इसके अलावा, कुमाऊं और गढ़वाल को जोड़ने वाली कंडी सड़क का निर्माण, बदहाल स्वास्थ्य एवं शिक्षा व्यवस्था, और सत्ता पर माफियाओं के बढ़ते दखल पर भी गहरा रोष व्यक्त किया गया।
आंदोलनकारियों की प्रमुख माँगें
प्रतिनिधिमंडल ने जिलाधिकारी के सम्मुख अपनी समस्याओं का विस्तृत विवरण रखते हुए निम्नलिखित माँगें प्रस्तुत कीं:
- स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा: राज्य आंदोलनकारियों को भी स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की भांति समस्त सुविधाएं और सम्मान दिया जाए।
- 10% क्षैतिज आरक्षण का क्रियान्वयन: सरकार द्वारा घोषित 10% क्षैतिज आरक्षण का लाभ अभी तक धरातल पर नहीं दिख रहा है। इसे तत्काल प्रभावी रूप से लागू किया जाए ताकि आंदोलनकारियों के आश्रितों को न्याय मिल सके।
- लंबित चिह्नीकरण प्रक्रिया: चिह्नीकरण से वंचित रह गए आंदोलनकारियों के आवेदन विभिन्न जनपदों में धूल फांक रहे हैं। सरकार द्वारा घोषणा के बावजूद प्रशासन की सुस्ती के कारण पात्र लोग लाभ से वंचित हैं। इन आवेदनों का तत्काल निस्तारण किया जाए।
प्रतिनिधिमंडल की उपस्थिति
इस अवसर पर वरिष्ठ आंदोलनकारी प्रभात ध्यानी, भुवन जोशी, पुष्कर दुर्गापाल, शेर सिंह लटवाल, बृजमोहन सिजवाली, पान सिंह नेगी और रईस अहमद मुख्य रूप से उपस्थित रहे। सभी वक्ताओं ने एक सुर में कहा कि यदि सरकार ने रजत जयंती वर्ष के भीतर इन बुनियादी मांगों और राज्य की अवधारणा से जुड़े सवालों का समाधान नहीं किया, तो आंदोलन को फिर से तेज किया जाएगा।
