रामनगर।तर्क विज्ञान, विवेकशीलता और मानवतावादी विचारों के संवाहक शहीद डॉ. नरेंद्र दाभोलकर के शहादत दिवस के अवसर पर ‘साइंस फॉर सोसाइटी (यू)’ द्वारा एक विशेष परिचर्चा एवं स्लाइड शो कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम का मुख्य विषय “विज्ञान ज्ञान की टॉर्च लाइट: क्या रोशनी अब भी अधूरी है?” रखा गया, जिसमें समाज में फैले अंधविश्वास और वैज्ञानिक सोच की वर्तमान स्थिति पर गंभीर मंथन हुआ।
कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में सेंट स्टीफेंस कॉलेज, दिल्ली में भौतिक विज्ञान के प्रोफेसर संजय कुमार ने शिरकत की। उन्होंने अपने वक्तव्य और स्लाइड शो के माध्यम से समाज में वैज्ञानिक दृष्टिकोण (Scientific Temperament) के महत्व को रेखांकित किया।
“नींबू-मिर्ची नहीं, सोच और सिस्टम बदलने से रुकेंगी दुर्घटनाएं”
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए प्रोफेसर संजय कुमार ने देश में गहराई से जड़ जमा चुके अंधविश्वासों पर तीखा प्रहार किया। उन्होंने एक व्यावहारिक उदाहरण देते हुए कहा कि भारत में लोग नई गाड़ी खरीदने पर उसकी बाकायदा पूजा-अर्चना करते हैं और सुरक्षा के नाम पर उस पर नींबू-मिर्ची लटकाते हैं। इसके बावजूद कड़वी सच्चाई यह है कि देश में हर साल लगभग दो लाख लोग सड़क दुर्घटनाओं में अपनी जान गंवा देते हैं।
उन्होंने जोर देकर कहा कि सड़क दुर्घटनाएं किसी टोने-totke या नींबू-मिर्ची से नहीं रुक सकतीं। इसके लिए सबसे पहले वाहन चालकों की मनोस्थिति और नागरिक बोध में बदलाव की जरूरत है। साथ ही सड़कों की संरचना और यातायात व्यवस्था (Traffic System) को दुरुस्त करना ही दुर्घटनाओं को रोकने का असली वैज्ञानिक समाधान है।

खगोल विज्ञान से लेकर जीवन की उत्पत्ति का दिलचस्प सफर
भौतिक विज्ञान के प्रोफेसर ने उपस्थित युवाओं और छात्रों को ब्रह्मांड के रहस्यों से रूबरू कराया। उन्होंने जीवन की उत्पत्ति, जीव-जंतुओं के जन्म व मृत्यु की प्राकृतिक प्रक्रियाओं, आकाशगंगाओं (Galaxies) और खगोल विज्ञान (Astronomy) से जुड़ी कई दिलचस्प और ज्ञानवर्धक जानकारियां साझा कीं।
प्रोफेसर कुमार ने बताया कि जब मानव सभ्यता के पास लिपि का ज्ञान नहीं था, तब भी आदिम मानव अपने आसपास के वातावरण से ज्ञान अर्जित कर रहा था। इसी जिज्ञासा के कारण खगोल विज्ञान विश्व का सबसे पहला विज्ञान बना।
उन्होंने स्लाइड शो के माध्यम से ऐतिहासिक उदाहरणों की एक श्रृंखला प्रस्तुत की:
- 5,000 वर्ष पुरानी स्टोनहेंज वेधशाला: प्राचीन काल में मानव द्वारा खगोलीय घटनाओं को समझने के प्रयास।
- टॉलेमी का मॉडल: ब्रह्मांड की शुरुआती वैज्ञानिक अवधारणाएं।
- गैलीलियो की दूरबीन खोज: गैलीलियो द्वारा बृहस्पति (Jupiter) के चार प्राकृतिक उपग्रहों (Moons) की ऐतिहासिक खोज और उससे विज्ञान में आई क्रांति।
छात्र-छात्राओं के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण क्यों जरूरी?
आज के आधुनिक युग में वैज्ञानिक सोच की आवश्यकता पर बल देते हुए प्रोफेसर संजय कुमार ने कहा कि समाज के प्रत्येक नागरिक और विशेष रूप से छात्र-छात्राओं को अपने भीतर वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करना चाहिए।
उन्होंने स्पष्ट किया कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण का आधार जिज्ञासा (Curiosity) है। विज्ञान कोई केवल किताबों में बंद विषय नहीं है, बल्कि यह हमारी व्यावहारिक सोच और ज्ञान प्रक्रिया को तराशता है। यह किसी भी घटना को आँख बंद करके स्वीकार करने के बजाय उसे देखने, समझने और तर्क की कसौटी पर परखने का तरीका सिखाता है।

‘पहले जानो, फिर मानो’ के संकल्प के साथ समापन
कार्यक्रम के समापन सत्र में गिरीश चंद्र ने उपस्थित विद्यार्थियों, शिक्षकों और विभिन्न सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कार्यक्रम का सार प्रस्तुत करते हुए कहा कि हमें अपने जीवन में बिना सोचे-समझे किसी भी बात पर भरोसा नहीं करना चाहिए।
उन्होंने सभी से “पहले जानो, फिर मानो” के सिद्धांत को अपनाने की अपील की ताकि जीवन में अंधविश्वास की जगह तर्क और वैज्ञानिक चेतना को स्थापित किया जा सके।
सांस्कृतिक प्रस्तुति और गणमान्य उपस्थिति
कार्यक्रम का कुशल संचालन मदन सिंह द्वारा किया गया। इस अवसर पर जन कवि बल्ली सिंह चीमा ने अपनी रचनाओं के माध्यम से जनवादी गीत और चेतना जगाने वाली कविताएं प्रस्तुत कीं, जिन्हें श्रोताओं की भारी सराहना मिली।
इस आयोजन में जीपीपी कन्या इंटर कॉलेज, राजकीय इंटर कॉलेज जस्सा गाजा और पीएनजी डिग्री कॉलेज के छात्र-छात्राओं एवं शिक्षकों के साथ-साथ बड़ी संख्या में सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।