रामनगर।उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलन के इतिहास में मुजफ्फरनगर का रामपुर तिराहा कांड एक ऐसा काला पन्ना है, जिसकी कसक तीन दशक से भी अधिक समय बीत जाने के बाद भी हर उत्तराखंडी के दिल में ताजा है। इस दर्दनाक घटना की बरसी के अवसर पर रामनगर के लखनपुर शहीद पार्क में राज्य आंदोलनकारियों और सिविल सोसाइटी से जुड़े नागरिकों ने एकत्र होकर एक भावुक और आक्रोशपूर्ण श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया।
शहीदों की याद में आयोजित इस सभा में जहाँ एक ओर नम आंखों से श्रद्धांजलि अर्पित की गई, वहीं दूसरी ओर 32 वर्षों के लंबे इंतजार के बावजूद खटीमा, मसूरी और मुजफ्फरनगर कांड के दोषियों को सजा न मिलने पर राज्य सरकार और प्रशासनिक व्यवस्था के खिलाफ तीखा आक्रोश देखने को मिला।
32 वर्षों बाद भी न्याय की आस, दोषियों को सजा न मिलने पर भड़के लोग
लखनपुर शहीद पार्क में आयोजित इस श्रद्धांजलि सभा की अध्यक्षता राज्य निर्माण आंदोलनकारी मंच के संयोजक चंद्रशेखर जोशी ने की, जबकि मंच संचालन उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी के अध्यक्ष और राज्य आंदोलनकारी प्रभात ध्यानी द्वारा किया गया।
सभा में मौजूद वक्ताओं ने कड़े शब्दों में नाराजगी जताते हुए कहा कि राज्य गठन को ढाई दशक से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन आज तक उस भयानक त्रासदी के दोषियों को कानून के शिकंजे में नहीं लाया जा सका। न्याय मिलने में हो रही इस असीम देरी ने आंदोलनकारियों और शहीदों के परिवारों के जख्मों को फिर से हरा कर दिया है।
राज्य की मूल अवधारणा से भटकीं सत्ताएं: स्थाई राजधानी तक नहीं
श्रद्धांजलि सभा में सिर्फ अतीत के पन्नों पर ही बात नहीं हुई, बल्कि वर्तमान उत्तराखंड की बदहाली पर भी गंभीर मंथन किया गया। वक्ताओं ने आरोप लगाया कि राज्य गठन के बाद से सत्ता में आई राजनीतिक पार्टियों ने उत्तराखंड आंदोलन के मूल उद्देश्यों और सपनों को पूरी तरह दरकिनार कर दिया है।
वक्ताओं ने एक कड़वी सच्चाई को उजागर करते हुए कहा कि उत्तराखंड शायद देश का ऐसा अनोखा राज्य है जहाँ:
- राज्य बनने के इतने वर्षों बाद भी अपनी कोई स्थाई राजधानी तय नहीं हो सकी है।
- कुमाऊं और गढ़वाल मंडल को आपस में सीधे और सुगम तरीके से जोड़ने वाला कोई ठोस मार्ग अब तक तैयार नहीं किया जा पाया है।
स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार की बदहाली पर उठते सवाल
उत्तराखंड के मौजूदा सामाजिक और आर्थिक हालात पर चिंता व्यक्त करते हुए आंदोलनकारियों ने कहा कि जिस खुशहाल प्रदेश का सपना देखकर लोगों ने अपनी कुर्बानियां दी थीं, वह आज मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रहा है।
- शिक्षा और स्वास्थ्य की बदहाली: प्रदेश में दूरदराज के इलाकों में स्वास्थ्य सेवाएं बदहाल हैं, जबकि सरकारी स्कूल लगातार बंद हो रहे हैं।
- बेरोजगारी और युवाओं की चिंता: राज्य का युवा वर्ग आज रोजगार की कमी के कारण अपने भविष्य को लेकर बेहद चिंतित है, जिससे समाज में निराशा का माहौल बन रहा है।
- भूमि हक से वंचित लोग: वन भूमि और नजूल भूमि पर दशकों से बसे लोगों को आज तक उनका मालिकाना हक नहीं मिल पाया है।
- भ्रष्टाचार और नशा: राज्य में बढ़ता भ्रष्टाचार और अवैध नशे का कारोबार उत्तराखंड की नई पीढ़ी को दीमक की तरह चाट रहा है।
वक्ताओं ने चेतावनी दी कि अगर जनसमस्याओं और युवाओं के असंतोष को समय रहते हल नहीं किया गया, तो यह आने वाले समय में एक बड़े जनांदोलन और विस्फोटक स्थिति का रूप ले सकता है।
शहीदों के सपनों का उत्तराखंड बनाने का लिया संकल्प
कार्यक्रम के अंतिम चरण में उपस्थित सभी आंदोलनकारियों और नागरिकों ने 2 मिनट का मौन रखकर शहीदों की प्रतिमा पर पुष्प अर्पित किए और उन्हें नमन किया। सभा में मौजूद सभी लोगों ने एक स्वर में संकल्प लिया कि जब तक शहीदों के सपनों का पारदर्शी, विकसित और जनहितकारी उत्तराखंड नहीं बन जाता, तब तक उनका यह संघर्ष और आवाज उठाने का सिलसिला अनवरत जारी रहेगा।
कार्यक्रम में इनकी रही उपस्थिति
इस श्रद्धांजलि और विरोध सभा में गोविंद सिंह बिष्ट, पुष्कर दुर्गापाल, मनमोहन अग्रवाल, लालता प्रसाद श्रीवास्तव, प्रभात ध्यानी, राजेंद्र खुल्वे, जुल्फिकार अली, गिरीश आर्य, डॉ. धनेश्वरी घिल्डियाल, कमला जोशी, सुमित्रा बिष्ट, देवकी असनोड़ा, योगेश सती, शेर सिंह लटवाल, ललित रावत, ताराचंद घिल्डियाल, भगत सिंह बिष्ट, प्रमोद उपाध्याय, नवेंदु जोशी, चंद्रशेखर जोशी, शाहिद, रईस अहमद, लालमणी, इन्द्र सिंह मनराल, हरीश भट्ट, सुनील परनवाल, आसिफ, मोहन चन्द्र तिवारी, गोपाल चिलवाल, हाफिज सईद अहमद, दिनेश सत्यवली, अमित लोहनी, ईरम, टीके खान, फरहान खान, देवेन्द्र भट्ट और मोहन राम समेत बड़ी संख्या में स्थानीय नागरिक उपस्थित रहे।