पिथौरागढ़ / मुनस्यारी:हिमालय की गोद में बसे उत्तराखंड के सीमांत इलाके मुनस्यारी में एक नई क्रांति आकार ले रही है। गोरी गंगा की हिमनदीय जलधाराओं और ठंडे मौसम के बीच रेनबो ट्राउट मछली का उत्पादन अब सिर्फ स्थानीय आजीविका तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय पहचान बना रहा है। हाल ही में मुनस्यारी कोल्डवॉटर फिशरीज क्लस्टर और नामजाला ट्राउट फार्म में मत्स्य विकास कार्यों का जायजा लिया गया, जहाँ यह सामने आया कि पारंपरिक खेती पर निर्भर रहने वाले किसान अब मछली पालन को अर्ध-व्यावसायिक उद्यम के रूप में अपनाकर अपनी तकदीर संवार रहे हैं।
मुनस्यारी का जोहार मत्स्य स्वायत्त सहकारिता इस बदलाव की मुख्य धुरी बना हुआ है। स्थानीय जल निकायों का तापमान रेनबो ट्राउट के लिए बेहद अनुकूल है, जिसके चलते यह क्षेत्र पूरे देश में शीतजल मत्स्य पालन का एक बड़ा केंद्र बनकर उभर रहा है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बजा डंका: नेपाल को निर्यात और आईटीबीपी से करार
उत्तराखंड ने मत्स्य पालन के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक कीर्तिमान हासिल किया है। जून 2026 में राज्य ने पहली बार नेपाल को ट्राउट मछली का अंतरराष्ट्रीय निर्यात शुरू किया। इसके अलावा स्थानीय स्तर पर बाजार की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) के साथ एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) किया गया है, जिसके तहत सीमा पर तैनात जवानों को ताजा और पौष्टिक ट्राउट मछली की आपूर्ति की जा रही है।
इस कदम से सीमांत गांवों में रहने वाले लोगों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति में बड़ा सुधार आया है। इससे न केवल स्थानीय स्तर पर रोजगार बढ़ा है, बल्कि ईको-टूरिज्म को भी एक नई दिशा मिली है।
पीएमएमएसवाई के तहत 2,299 करोड़ रुपये का बड़ा निवेश
देशभर में अधिसूचित 34 मत्स्य क्लस्टरों में से पिथौरागढ़ को विशेष रूप से ‘शीतजल मत्स्य क्लस्टर’ के रूप में प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (पीएमएमएसवाई) के तहत चुना गया है। देश के पर्वतीय क्षेत्रों—उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश—में इस क्षेत्र की अपार संभावनाएं हैं।
केंद्र सरकार द्वारा पर्वतीय राज्यों में शीतजल मत्स्य पालन के लिए 2,299 करोड़ रुपये से अधिक की राशि स्वीकृत की गई है। इस बजट के जरिए आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया जा रहा है:
- रेसवे और हैचरी: पर्वतीय क्षेत्रों में 5,600 से अधिक रेसवे और 54 आधुनिक हैचरी स्वीकृत की गई हैं।
- कोल्ड स्टोरेज और फीड मिल: 293 नए कोल्ड स्टोरेज और 260 फीड मिल का ढांचा तैयार किया जा रहा है।
- उत्पादन में उछाल: बीते एक दशक में सुनियोजित प्रयासों के चलते देश में ट्राउट उत्पादन छह गुना बढ़कर लगभग 5,000 मीट्रिक टन प्रतिवर्ष तक पहुँच गया है।
उत्तराखंड के लिए 317 करोड़ की योजनाएं और विशेष ‘ट्राउट प्रोत्साहन योजना’
राज्य में मत्स्य पालन को और गति देने के लिए 317 करोड़ रुपये की विभिन्न विकास परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है। इसके तहत आधुनिक मत्स्य बाजार, लैंडिंग सेंटर और सितारगंज में एक एकीकृत एक्वापार्क स्थापित किया जाएगा।
इसके साथ ही राज्य सरकार ने 170 करोड़ रुपये के बजट के साथ एक समर्पित ‘ट्राउट प्रोत्साहन योजना’ लागू की है। इस योजना का लक्ष्य वर्ष 2028-29 तक राज्य में 1,500 रेसवे, 100 मिनी हैचरी और 600 कोल्ड स्टोरेज सुविधाएं स्थापित करना है, ताकि दूरदराज के गांवों में भी किसानों को बुनियादी ढांचा मिल सके।
वैज्ञानिक सहयोग से बढ़ी किसानों की आय
मुनस्यारी में ट्राउट पालन को सफल बनाने में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के भीमताल स्थित केंद्रीय शीतजल मात्स्यिकी अनुसंधान निदेशालय (डीसीएफआर) की भूमिका बेहद अहम रही है। संस्थान द्वारा मत्स्य पालकों को उन्नत किस्म के बीज, रोग प्रबंधन की जानकारी और वैज्ञानिक प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
पहाड़ी क्षेत्रों की स्वच्छ जलधाराएं और उच्च हिमालयी झीलें उच्च मूल्य वाली ट्राउट और संकटग्रस्त महाशीर जैसी प्रजातियों के संरक्षण में भी मददगार साबित हो रही हैं। यह पहल पर्वतीय क्षेत्रों से होने वाले पलायन को रोकने और सीमांत अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भर बनाने में सबसे कारगर साबित हो रही है।