थाली से गायब हो रही रोटी और रसोई का बिगड़ा बजट: मालधन में बढ़ती महंगाई के खिलाफ महिलाओं का जोरदार प्रदर्शन
रामनगर (उत्तराखंड)। देश भर में लगातार आसमान छूती महंगाई ने आम आदमी की कमर तोड़कर रख दी है। खाने-पीने की चीज़ों से लेकर घरेलू सामान के दाम जिस तेजी से बढ़े हैं, उसने गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों के सामने दो वक्त की रोटी का संकट खड़ा कर दिया है। इसी मुद्दे को लेकर रामनगर के मालधन क्षेत्र में प्रगतिशील महिला एकता केंद्र के बैनर तले दर्जनों महिलाओं ने सड़कों पर उतरकर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोला और जोरदार जुलूस निकालकर प्रदर्शन किया।
जुलूस के बाद आयोजित सभा में वक्ताओं ने केंद्र और राज्य सरकार की नीतियों पर जमकर निशाना साधा। वक्ताओं का कहना था कि रोजमर्रा के इस्तेमाल में आने वाली चीजें जैसे चीनी, दाल, तेल और हरी सब्जियों के दाम इतने अधिक बढ़ चुके हैं कि आम इंसान की पहुंच से बाहर होते जा रहे हैं।

आमदनी ठप, लेकिन खर्च दोगुने: रसोई चलाना हुआ दूभर
प्रदर्शन के दौरान हुई जनसभा को संबोधित करते हुए प्रगतिशील महिला एकता केंद्र की प्रतिनिधि तुलसी छिंवाल ने कहा कि बढ़ती महंगाई के कारण आम जनता का जीना दूभर हो गया है। देश की बड़ी गरीब और निम्न-मध्यम वर्गीय आबादी की कमाई में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है, जबकि महंगाई हर दिन नए रिकॉर्ड बना रही है।
तुलसी छिंवाल ने कहा कि आमदनी स्थिर रहने और खर्च कई गुना बढ़ जाने से मजदूर और मेहनतकश परिवारों को अपने दैनिक खान-पान में भी कटौती करनी पड़ रही है। घर की महिलाओं के लिए रसोई चलाना एक चुनौती बन गया है। नीतियां ऐसी बनाई जा रही हैं, जिनसे आम आदमी बेहाल है, जबकि दूसरी ओर उद्योगपति और अमीर वर्ग लगातार फल-फूल रहे हैं।

3 हजार रुपये में कैसे चलेगा घर? भोजनमाताओं ने उठाया मानदेय का मुद्दा
सभा में प्रगतिशील भोजनमाता संगठन की उत्तराखंड अध्यक्ष शारदा देवी ने राज्य सरकार को आड़े हाथों लिया। उन्होंने धामी सरकार से सीधा सवाल किया कि इस भीषण महंगाई के दौर में महज 3,000 रुपये महीने के मामूली मानदेय पर कोई भोजनमाता अपना और अपने परिवार का पेट कैसे पाल सकती है?
शारदा देवी ने मांग की कि सरकार को तुरंत प्रभाव से महंगाई पर लगाम लगानी चाहिए। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि विद्यालयों में काम करने वाली भोजनमाताओं से बेगारी कराना तुरंत बंद किया जाए। उत्तराखंड की सभी भोजनमाताओं को चतुर्थ श्रेणी (Class IV) के सरकारी कर्मचारी का दर्जा दिया जाए और उसी के अनुसार उन्हें पूरा वेतन, सुविधाएं व सामाजिक सुरक्षा प्रदान की जाए।

विकास के दावों और जीडीपी के आंकड़ों पर उठाए सवाल
इंकलाबी मजदूर केंद्र के महासचिव रोहित रुहेला ने जनसभा को संबोधित करते हुए कहा कि सरकार जीडीपी के आंकड़ों के जरिए देश में विकास की एक काल्पनिक तस्वीर पेश कर रही है। जमीनी हकीकत इन सरकारी दावों से बिल्कुल अलग है। आज देश के आम नागरिकों की थाली से पौष्टिक खाना ही नहीं, बल्कि जरूरत भर की रोटियां भी कम होती जा रही हैं।
कार्यक्रम के दौरान परिवर्तनकामी छात्र संगठन की प्रीति आर्य और इंकलाबी मजदूर केंद्र के उबैदुल हक ने भी अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि जब तक बुनियादी जरूरतों की कीमतें काबू में नहीं आतीं और मजदूरों को सही मजदूरी नहीं मिलती, तब तक जन-आंदोलन जारी रहेगा।

ग्रामीण महिलाओं की बड़े पैमाने पर भागीदारी
मालधन में निकले इस जुलूस और विरोध-प्रदर्शन में क्षेत्र की महिलाओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। प्रदर्शन में पुष्पा, मंजू, शांति, सीमा, कमलेश, आशा और विमला समेत दर्जनों ग्रामीण महिलाओं ने भाग लिया और नारेबाजी कर अपनी आवाज बुलंद की। प्रदर्शनकारियों ने साफ कहा कि यदि सरकार ने जल्द ही आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में कटौती नहीं की, तो यह आंदोलन और अधिक व्यापक रूप लेगा।