रामनगर।देश और दुनिया में जब असमानता, महंगाई और असुरक्षा का दायरा तेजी से बढ़ता जा रहा है, तब महिलाओं ने अपने हक और हुकूक के लिए आवाज और बुलंद करने का फैसला किया है। रामनगर के ऐतिहासिक भगत सिंह चौक पर क्रांति के प्रतीक भगत सिंह की प्रतिमा पर माल्यार्पण और संगठन का ध्वजारोहण कर प्रगतिशील महिला एकता केंद्र के दो दिवसीय चौथे सम्मेलन का जोरदार आगाज हुआ। यह सम्मेलन महज एक औपचारिक बैठक नहीं, बल्कि आज के दौर में महिलाओं पर हो रहे चौतरफा हमलों के खिलाफ एक जुझारू संघर्ष की रूपरेखा तय करने का पड़ाव बन गया है।

मजदूर आबादी पर चौतरफा मार, महिलाओं पर सबसे तीखा प्रहार
सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में वर्तमान आर्थिक और सामाजिक संकट पर बेबाकी से बात रखी गई। वर्तमान समय में पूरी मजदूर और मेहनतकश आबादी भीषण जीवन संकट का सामना कर रही है। एक तरफ आसमान छूती महंगाई, बेरोजगारी और चरमराती स्वास्थ्य सुविधाएं आम आदमी की कमर तोड़ रही हैं, तो दूसरी तरफ दिन-ब-दिन घटती मजदूरी ने इस संकट को और अधिक भयावह बना दिया है।
इस पूरे आर्थिक ढांचे में सबसे ज्यादा पिसने के लिए महिलाएं मजबूर हैं। जो मजदूर महिलाएं पहले से ही पुरुष मजदूरों की तुलना में असमान वेतन पा रही थीं, उनकी मजदूरी में अब और तेजी से कटौती की जा रही है। इसके साथ ही रोजगार के नए अवसर लगातार सिमट रहे हैं, जिससे मेहनतकश महिलाओं के सामने आजीविका का गंभीर संकट खड़ा हो गया है।

बढ़ती यौन हिंसा, सामाजिक बंदिशें और जनवादी अधिकारों पर हमला
सम्मेलन में इस बात पर गंभीर चिंता व्यक्त की गई कि समाज में महिलाओं के प्रति यौन हिंसा और असुरक्षा का माहौल लगातार गहराता जा रहा है। इसके साथ ही सामाजिक और राजनीतिक ताने-बाने में हावी हो रही फासीवादी ताकतें महिलाओं की आजादी और उनके संवैधानिक अधिकारों को निशाना बना रही हैं।
आज स्थिति यह हो गई है कि महिलाओं के पहनने-ओढ़ने, उनके खान-पान से लेकर उनके अपने जीवनसाथी को चुनने तक के व्यक्तिगत और जनवादी अधिकारों पर नियंत्रण करने की कोशिशें की जा रही हैं। अभिव्यक्ति की आजादी और लोकतांत्रिक तरीके से विरोध दर्ज कराने या संगठित होने के बुनियादी अधिकारों को लगातार कुचला जा रहा है। विशेष रूप से उन महिलाओं और महिला कार्यकर्ताओं को निशाना बनाया जा रहा है, जो शोषित, पीड़ित और मेहनतकश महिलाओं के अधिकारों के लिए मजबूती से आवाज उठाती हैं।

4 सालों का लेखा-जोखा और रिपोर्ट पारित
सम्मेलन के पहले दिन बीते चार वर्षों के दौरान अंतर्राष्ट्रीय, राष्ट्रीय और स्थानीय स्तर पर महिलाओं की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक स्थिति में आए बदलावों पर विस्तृत और गहन चर्चा की गई। गहन विचार-विमर्श के बाद एक विस्तृत रिपोर्ट पेश कर उसे सर्वसम्मति से पारित किया गया।
सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य आने वाले दो दिनों में देश-दुनिया के इस आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक संकट पर गहराई से विचार करना है। इसके जरिए यह तय किया जाएगा कि आने वाले समय में महिलाओं के अधिकारों के आंदोलन को किस दिशा में आगे बढ़ाया जाए और संघर्ष के कौन से नए रास्ते अख्तियार किए जाएं।

एकजुटता ही संघर्ष की एकमात्र राह
दिनभर चले विचार-मंथन सत्रों में विभिन्न वक्ताओं ने अपनी बात रखते हुए इस बात पर जोर दिया कि फासीवादी और शोषक ताकतों का मुकाबला केवल और केवल एकजुटता से ही किया जा सकता है। जब तक मजदूर और मेहनतकश महिलाएं अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होकर संगठित नहीं होंगी, तब तक इस चौतरफा हमले को नहीं रोका जा सकता। वक्ताओं ने आह्वान किया कि अब समय आ गया है जब तमाम दबाव और दमन के बावजूद महिलाओं को अपनी सुरक्षा, समानता और आजादी के लिए संघर्ष को और तेज करना होगा।
इस दो दिवसीय सम्मेलन में नीता, रजनी जोशी, बिंदु गुप्ता, पुष्पा, तुलसी छिम्वाल, रिचा पांडेय, हेमा, शारदा दीपा, गीता, शोभा, सहिस्ता सहित बड़ी संख्या में महिला प्रतिनिधियों और कार्यकर्ताओं ने सक्रिय सहभागिता निभाई। सम्मेलन के दूसरे दिन भावी रणनीति और आंदोलन के नए प्रस्तावों पर अंतिम मुहर लगाई जाएगी।