रामनगर। “सीखने की कोई उम्र नहीं होती और ज्ञान की कोई अंतिम सीमा नहीं होती।” इस कहावत को उत्तराखंड के रामनगर निवासी एडवोकेट पूरन चंद्र पांडे ने पूरी तरह सच साबित कर दिखाया है। जहां लोग एक या दो डिग्रियां हासिल करने के बाद अपनी पढ़ाई को विराम दे देते हैं, वहीं पूरन चंद्र पांडे का ज्ञान का सफर करीब तीन दशकों से लगातार जारी है। वर्ष 1998 में शुरू हुआ यह सिलसिला आज 19 डिग्रियों तक पहुँच चुका है। ताज्जुब की बात यह है कि 19 डिग्रियां हासिल करने के बाद भी उनका मन नहीं भरा है और उन्होंने अब 20वीं डिग्री के रूप में एमबीए (मास्टर ऑफ बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन) करने की दिशा में कदम बढ़ा दिया है।
1998 से शुरू हुआ निरंतर अध्ययन का सफर
पूरन चंद्र पांडे की उच्च शिक्षा की यात्रा वर्ष 1998 में उनकी पहली स्नातक (Graduation) डिग्री के साथ शुरू हुई थी। इसके बाद से उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। एक विषय की पढ़ाई पूरी होते ही उनके भीतर दूसरे विषय को जानने और समझने की जिज्ञासा पैदा हो जाती थी। देखते ही देखते उन्होंने एक के बाद एक अलग-अलग संकायों में दाखिला लिया और सफलता हासिल की।
कानून (Law) के क्षेत्र में महारत हासिल करने के साथ-साथ उन्होंने समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र, मानवाधिकार, मनोविज्ञान, शिक्षा शास्त्र, राजनीति विज्ञान, इतिहास, हिंदी, योग, जनसंचार, दर्शनशास्त्र, ज्योतिष, पत्रकारिता, महात्मा गांधी एवं शांति अध्ययन और विकास अध्ययन (Development Studies) जैसे विविध विषयों में डिग्रियां प्राप्त की हैं।

कानून के क्षेत्र में उनका विशेष योगदान रहा है, जहाँ उन्होंने एलएलबी (LL.B.), एलएलएम (LL.M.) और पीएचडी (Ph.D.) जैसी सर्वोच्च शैक्षणिक उपाधियाँ अर्जित की हैं। उनका मानना है कि जब व्यक्ति अलग-अलग विषयों का अध्ययन करता है, तो उसकी सोच का दायरा विस्तृत होता है और वह सामाजिक समस्याओं को ज्यादा बेहतर दृष्टिकोण से समझ पाता है।
चार प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों से हासिल कीं उपाधियाँ
पूरन चंद्र पांडे की यह अद्भुत शैक्षणिक यात्रा किसी एक संस्थान तक सीमित नहीं रही। उन्होंने देश के चार प्रमुख विश्वविद्यालयों—कुमाऊं विश्वविद्यालय (नैनीताल), इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (IGNOU), साबरमती विश्वविद्यालय (गुजरात) और उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय (UOU) से अपनी डिग्रियां पूरी की हैं।
वर्ष 2026 में उन्होंने उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय से ‘विकास अध्ययन’ (Development Studies) में अपनी 19वीं डिग्री सफलतापूर्वक पूरी की। 19वीं डिग्री की मार्कशीट हाथ में आते ही उन्होंने अपनी अगली मंजिल तय कर ली और एमबीए (MBA) में प्रवेश के लिए आवेदन जमा कर दिया।
वकालत, शोध और अकादमिक क्षेत्र में बहुआयामी पहचान
पेशे से अधिवक्ता पूरन चंद्र पांडे केवल किताबों तक सीमित नहीं हैं। कोर्ट-कचहरी की व्यस्त दिनचर्या और वकालत की प्रैक्टिस के बावजूद वे अकादमिक और सामाजिक शोध में लगातार सक्रिय रहते हैं। विभिन्न सामाजिक, कानूनी और समसामयिक मुद्दों पर उनके शोध पत्र और लेख अक्सर प्रकाशित होते रहते हैं। वे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के कई बड़े सेमिनारों में अपने विचार व्यक्त कर चुके हैं।
उनकी सबसे बड़ी खासियत यह रही है कि उन्होंने कानून को केवल एक सूखा कानूनी विषय मानकर नहीं पढ़ा, बल्कि उसे समाजशास्त्र, मानवाधिकार, पत्रकारिता और राजनीति विज्ञान के साथ जोड़कर देखा। उनका मानना है कि कानून का सीधा संबंध हर आम नागरिक की जिंदगी और सामाजिक व्यवस्था से है।
”मेरे लिए डिग्रियां नहीं, ज्ञान महत्वपूर्ण है”
अपनी इस अनूठी उपलब्धि पर पूरन चंद्र पांडे कहते हैं, “मेरे लिए डिग्रियां केवल कागज़ का टुकड़ा या प्रमाण-पत्र हासिल करने का जरिया नहीं हैं। जब भी मैं किसी नए विषय को पढ़ता हूँ, तो मुझे दुनिया और इंसानियत को देखने का एक नया नजरिया मिलता है। मेरा मुख्य उद्देश्य जीवन भर एक विद्यार्थी बनकर सीखते रहना है।”
वे आगे कहते हैं कि आज के दौर में शिक्षा को केवल नौकरी या रोजगार पाने का साधन मान लिया गया है, जो कि सही नहीं है। शिक्षा का असली मकसद व्यक्ति के विचार विकसित करना, उसे अधिकारों एवं कर्तव्यों के प्रति जागरूक बनाना और समाज में सकारात्मक बदलाव लाना है।
युवाओं के लिए बने प्रेरणा का स्रोत
लगभग 28-30 सालों की यह लंबी शैक्षणिक यात्रा सिर्फ डिग्रियों की संख्या की गिनती भर नहीं है, बल्कि यह लगन, समर्पण और अटूट इच्छाशक्ति की जीती-जागती मिसाल है। कोर्ट की जिम्मेदारियों, पारिवारिक जीवन और उम्र के पड़ावों के बीच भी पढ़ाई के प्रति ऐसा जुनून बहुत कम देखने को मिलता है।
20वीं डिग्री यानी एमबीए की तैयारी कर रहे पूरन चंद्र पांडे की यह कहानी आज के युवाओं, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्रों और शोधार्थियों को यह संदेश देती है कि सीखने की राह में उम्र कभी बाधा नहीं बनती। अगर मन में संकल्प हो, तो ज्ञान का यह सफर ताउम्र जारी रखा जा सकता है।