रामनगर:उत्तराखंड राज्य निर्माण की नींव जिन शहीदों के लहू से सींची गई थी, उनके सपने आज भी व्यवस्था की फाइलों में धूल फांक रहे हैं। 2 सितंबर 1994 को हुए दर्दनाक मसूरी गोलीकांड की वर्षगांठ पर रामनगर के लखनपुर स्पोर्ट्स क्लब में आयोजित गोष्ठी में यह टीस और जन-आक्रोश खुलकर सामने आया। ‘उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी मंच’ के बैनर तले जुटे राज्य आंदोलनकारियों, बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने शहीदों को याद करते हुए स्पष्ट किया कि राज्य अपने मूल उद्देश्यों से भटक चुका है और अब जल, जंगल, जमीन के अधिकारों के लिए एक और बड़े जन-आंदोलन की जरूरत है।

जनकवि बल्ली सिंह चीमा ने गीतों से जगाया जन-सरोकार
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता और प्रख्यात जनकवि बल्ली सिंह चीमा ने अपने तीखे और चेतना जगाने वाले संबोधन में कहा कि 1990 के दशक में राज्य पाने की चाह में हर धर्म, वर्ग और समुदाय के लोग सड़कों पर उतरे थे। आम जनता ने एक ऐसे पारदर्शी और जन-हितैषी राज्य की कल्पना की थी जहाँ पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी यहीं के काम आए। लेकिन बीते ढाई दशकों में आई सरकारों ने जन-आकांक्षाओं को पूरी तरह दरकिनार कर दिया है। चीमा ने अपने प्रसिद्ध जन-गीतों के माध्यम से आम जनता के जलते हुए सवालों को उठाया और कहा कि जब तक नीतियाँ जन-केंद्रित नहीं होंगी, तब तक सड़कों पर संघर्ष ही एकमात्र रास्ता बचता है।

26 सालों बाद भी अधूरे हैं बुनियादी सवाल
गोष्ठी में विभिन्न वक्ताओं ने राज्य की मौजूदा स्थिति और सरकारों की नीतियों पर कड़ा प्रहार किया। वक्ताओं ने एक सुर में कहा कि राज्य गठन के इतने वर्षों बाद भी उत्तराखंड अपनी पहचान और दिशा तलाश रहा है। सभा में मुख्य रूप से इन ज्वलंत मुद्दों पर चिंता व्यक्त की गई:
- गैरसैंण और स्थायी राजधानी: राज्य बनने के इतने समय बाद भी स्थायी राजधानी का मुद्दा अधर में लटका है।
- रोजगार और पलायन: पहाड़ों से युवाओं का पलायन लगातार जारी है, जबकि स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर शून्य बने हुए हैं।
- स्वास्थ्य व शिक्षा की बदहाली: ग्रामीण और पर्वतीय क्षेत्रों में न तो बेहतर अस्पताल हैं और न ही गुणवत्तापूर्ण शिक्षा।
- जल-जंगल-जमीन पर संकट: स्थानीय निवासियों को उनके प्राकृतिक संसाधनों के अधिकारों से बेदखल किया जा रहा है।
- कृषि संकट और जंगली जानवरों का आतंक: खेती-किसानी पर जंगली जानवरों के हमलों ने ग्रामीणों का जीवन दूभर कर दिया है।
- बढ़ता भ्रष्टाचार: पारदर्शी प्रशासन का वादा पूरी तरह खोखला साबित हुआ है।
दलगत राजनीति से ऊपर उठकर एकजुटता का आह्वान
मंच के संयोजक चंद्रशेखर जोशी ने गोष्ठी को संबोधित करते हुए कहा कि शहीदों की शहादत तभी सार्थक होगी जब राज्य के सभी नागरिक, सामाजिक संगठन और जागरूक वर्ग दलगत राजनीति, आपसी मतभेदों और व्यक्तिगत स्वार्थों से ऊपर उठकर एक साझा मंच पर आएँगे। उन्होंने कहा कि आज उत्तराखंड को बचाने के लिए नए सिरे से एकजुटता दिखाने का समय आ गया है।
गोष्ठी की अध्यक्षता प्रगतिशील महिला एकता केंद्र की शीला शर्मा ने की और संचालन आंदोलनकारी प्रभात ध्यानी ने सफलता पूर्वक किया।

आपदा पीड़ितों को दी गई श्रद्धांजलि
कार्यक्रम का समापन एक संवेदनशील क्षण के साथ हुआ। हाल के दिनों में उत्तराखंड, पड़ोसी देश नेपाल तथा भारत के विभिन्न हिस्सों में आई प्राकृतिक आपदाओं में जान गंवाने वाले लोगों के प्रति गहरा दुख व्यक्त किया गया। उपस्थित सभी लोगों ने 1 मिनट का मौन रखकर आपदा में मारे गए नागरिकों और राज्य आंदोलन के अमर शहीदों को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।
गोष्ठी में ये लोग रहे मौजूद
इस जन-गोष्ठी में क्षेत्र के तमाम प्रबुद्ध जन और आंदोलनकारी शामिल हुए। इनमें चंद्रशेखर जोशी, प्रभात ध्यानी, डॉ. धनेश्वरी घिल्डियाल, सुमित्रा बिष्ट, पीतांबरी रावत, गिरीश चंद्र आर्य, नवेंदु मठवाल, सुमित (आइसा), योगेश सती, इंद्र सिंह मनराल, पुष्कर दुर्गापाल, सुरेंद्र सिंह नेगी, सचिन कुमार, राजेंद्र खुल्बे, हीरा बल्लभ पाठक, नवीन नैथानी, लालता प्रसाद श्रीवास्तव, मोहन चंद तिवारी, नवेंदु जोशी, बचे सिंह डंगवाल, हेम पांडे, दिनेश सत्यवली, बसंत लाल वर्मा, शीला शर्मा, नीता और तुलसी छिम्बाल समेत बड़ी संख्या में नागरिक उपस्थित थे।