नई दिल्ली/रामनगर: दिल्ली के जंतर मंतर पर पिछले 21 दिनों से भूख हड़ताल पर बैठे पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को दिल्ली पुलिस द्वारा हिरासत में लिए जाने के बाद बवाल खड़ा हो गया है। इंकलाबी मजदूर केन्द्र ने पुलिस की इस कार्रवाई की कड़े शब्दों में निंदा करते हुए इसे आंदोलन को दबाने की तानाशाही कोशिश करार दिया है। संगठन ने इस घटनाक्रम को लेकर केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के साथ-साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तुरंत इस्तीफे की मांग की है।
बिना नोटिस आधी रात को जबरन उठाने का आरोप
प्राप्त जानकारी के अनुसार, 18 जुलाई की सुबह दिल्ली पुलिस ने जंतर मंतर पर शांतिपूर्ण ढंग से भूख हड़ताल पर बैठे सोनम वांगचुक को अचानक हिरासत में ले लिया और उन्हें अस्पताल में भर्ती करा दिया। आरोप है कि पुलिस ने बिना कोई पूर्व नोटिस दिए बेहद बेरहमी से कार्रवाई की। प्रत्यक्षदर्शियों और संगठन के पदाधिकारियों के अनुसार, वांगचुक को स्ट्रेचर के बजाय सफेद कपड़ों का पर्दा बनाकर जबरन एम्बुलेंस में डाल दिया गया। इस दौरान उनकी पत्नी को भी अस्पताल में उनसे मिलने की अनुमति नहीं दी गई। इंकलाबी मजदूर केन्द्र ने पुलिस की इस कार्रवाई को अमानवीय व्यवहार और बुनियादी अधिकारों का हनन बताया है।
नीट पेपर लीक को लेकर हो रहा था प्रदर्शन
जंतर मंतर पर चल रहा यह आंदोलन मुख्य रूप से देश में हुए हालिया पेपर लीक मामलों के विरोध में आयोजित किया गया था। नीट और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में हुई धांधलियों के खिलाफ छात्र और सामाजिक कार्यकर्ता लगातार केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर भूख हड़ताल पर बैठे थे। सोनम वांगचुक के अलावा आइसा, एसएफआई, एआईएसएफ, पंडास, कलेक्टिव, दिशा और एआईडीएसओ जैसे कई प्रमुख छात्र संगठनों के कार्यकर्ता भी जंतर मंतर पर लगातार डटे हुए हैं। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि देश में पेपर लीक के चलते मानसिक तनाव के कारण करीब 30 छात्र आत्महत्या जैसा आत्मघाती कदम उठा चुके हैं, जिसके लिए सीधे तौर पर शिक्षा मंत्रालय और सरकार की नीतियां जिम्मेदार हैं।
सरकार पर दमन चक्र चलाने का आरोप
इंकलाबी मजदूर केन्द्र के पत्रक में कहा गया है कि केंद्र सरकार जन आंदोलनों की सुध लेने और छात्रों की जायज मांगों को पूरा करने के बजाय दमनकारी नीतियां अख्तियार कर रही है। देश में निजीकरण और उदारीकरण की नीतियों के भयावह परिणाम सामने आ रहे हैं, जिससे छात्रों, मजदूरों और किसानों का जीवन लगातार दुश्वार होता जा रहा है। सरकार के खिलाफ आवाज उठाने वाले शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर मानेसर और नोएडा की तर्ज पर भारी दमन चक्र चलाया जा रहा है। हड़ताल और शांतिपूर्ण धरना प्रदर्शन को अपराध की श्रेणी में धकेलने की कोशिश की जा रही है, जो पूरी तरह से असंवैधानिक है।
पूंजीपति-कॉर्पोरेट गठजोड़ पर हमला
संगठन ने मुख्यधारा की कुछ मीडिया संस्थाओं पर भी निशाना साधते हुए कहा कि अपनी मांगों के लिए आंदोलन करने वाले आम लोगों को बदनाम करने की साजिश रची जाती है। जनता के संवैधानिक अधिकारों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। इंकलाबी मजदूर केन्द्र ने आम जनता, युवाओं और छात्रों से अपील की है कि वे इस दमनकारी नीति के खिलाफ एकजुट हों। संगठन ने किसानों और मजदूरों के साथ एक मजबूत एकता कायम करने का आह्वान किया है ताकि देश में बढ़ रहे कारपोरेट और पूंजीवादी ताकतों के गठजोड़ पर कड़ा प्रहार किया जा सके। संगठन ने स्पष्ट किया है कि छात्रों के इस न्यायसंगत आंदोलन को हर स्तर पर समर्थन जारी रहेगा और सरकार की तानाशाही नीतियों के खिलाफ आवाज बुलंद की जाती रहेगी।