उत्तराखंड में SIR का ‘सर्जिकल स्ट्राइक’: कागजों से निकलकर बूथों पर पहुंचेगी निर्वाचन आयोग की जांच, जानें क्या है 4% और 2% का बड़ा फॉर्मूला
देहरादून:उत्तराखंड में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) का दौर अब सिर्फ प्रशासनिक दफ्तरों और बंद फाइलों तक सीमित नहीं रहने वाला है। फर्जी नामों को हटाने और पात्र नागरिकों के नाम जोड़ने की कवायद में अब राज्य का निर्वाचन आयोग सीधे मैदान में उतर चुका है। दावे और आपत्तियों के बीच मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने स्पष्ट कर दिया है कि अब हर उस दावे की जमीनी हकीकत परखी जाएगी, जहां आंकड़ों में थोड़ा भी असामान्य उतार-चढ़ाव नजर आएगा।
इसके लिए राज्य भर में 15 दिनों का एक महा-सत्यापन (Field Verification) अभियान शुरू किया जा रहा है। इस अभियान के तहत मंडलायुक्तों से लेकर जिलाधिकारियों और निर्वाचक निबंधन अधिकारियों (ERO) को खुद फील्ड में उतरकर बूथों की कमान संभालनी होगी।

दोनों मंडलायुक्तों को मिला हाई-अलर्ट: आवंटित जिलों में जमाएंगे डेरा
सचिवालय में आयोजित एक उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक में मुख्य निर्वाचन अधिकारी डॉ. बीवीआरसी पुरुषोत्तम ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए सभी जिलाधिकारियों को सख्त दिशा-निर्देश जारी किए। निर्वाचन आयोग के नए खाके के तहत कुमाऊं और गढ़वाल मंडलायुक्तों को विशेष जिम्मेदारी सौंपी गई है।
- कुमाऊं मंडलायुक्त: अगले 15 दिनों तक नैनीताल और ऊधमसिंह नगर जिलों में कैंप करेंगे।
- गढ़वाल मंडलायुक्त: देहरादून और हरिद्वार जिलों में खुद डेरा डालकर फील्ड वेरिफिकेशन की निगरानी करेंगे।
इसके साथ ही संबंधित जिलों के जिलाधिकारी भी बिना किसी पूर्व सूचना के रैंडम फील्ड विजिट (अचानक निरीक्षण) करेंगे। इसका सीधा मकसद यह देखना है कि कागजों में जमा किए गए आवेदन और मौके की जमीनी हकीकत में कोई अंतर तो नहीं है।
किन बूथों पर रहेगी पैनी नजर?
जांच अभियान का मुख्य केंद्र बिंदु वे मतदान केंद्र (Booths) होंगे जहां नाम जोड़ने के लिए फॉर्म-6 और नाम हटाने/आपत्ति जताने के लिए फॉर्म-7 के सबसे ज्यादा आवेदन प्राप्त हुए हैं।
अक्सर यह देखा जाता है कि चुनाव या पुनरीक्षण प्रक्रिया के दौरान कुछ चुनिंदा बूथों पर असामान्य रूप से आवेदनों की बाढ़ आ जाती है। आयोग का मानना है कि ऐसे संवेदनशील और अधिक आवेदन वाले बूथों का क्रॉस-वेरिफिकेशन (दोहरा सत्यापन) करके ही निष्पक्ष मतदाता सूची तैयार की जा सकती है।
4% और 2% का ‘सुपर फॉर्मूला’: हर फॉर्म की होगी बारीक जांच
निर्वाचन आयोग ने धांधली और गफलत को रोकने के लिए निगरानी का एक सख्त पैमाना तय किया है:
- फॉर्म-6 का 4% नियम: जिन बूथों पर कुल मतदाताओं के सापेक्ष फॉर्म-6 (नया नाम जोड़ने) के आवेदन 4 प्रतिशत से अधिक आएंगे, वहां निर्वाचक निबंधन अधिकारी (ERO) को एक-एक आवेदन की व्यक्तिगत और गहन जांच (Cross Verification) करनी होगी।
- फॉर्म-7 का 2% नियम: जिन बूथों पर फॉर्म-7 (नाम हटाने/कटवाने) के आवेदन 2 प्रतिशत से अधिक दर्ज होंगे, वहां भी आयोग सभी आवेदनों की दोबारा पड़ताल करेगा।
इस फॉर्मूले के जरिए आयोग यह सुनिश्चित करना चाहता है कि किसी पात्र नागरिक का नाम जानबूझकर मतदाता सूची से न काटा जाए और न ही किसी अपात्र या फर्जी व्यक्ति का नाम सूची में दर्ज हो सके।
तय समयसीमा में निपटाए जाएंगे फॉर्म-6, 7 और 8
मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने बैठक में सख्त लहजे में कहा कि फॉर्म-6 (नाम जोड़ना), फॉर्म-7 (नाम हटाना) और फॉर्म-8 (संशोधन व पता बदलना) के तहत प्राप्त सभी दावों और आपत्तियों का निस्तारण नियमानुसार और तय समयसीमा के भीतर ही पूरा किया जाना चाहिए। काम में ढिलाई बरतने वाले अधिकारियों के खिलाफ सख्त रुख अपनाया जा सकता है।
आखिर क्यों जरूरी हो गया यह फील्ड वेरिफिकेशन?
उत्तराखंड के मैदानी और पहाड़ी जिलों में जनसांख्यिकीय बदलाव, पलायन और नए आवासीय क्षेत्रों के विकास के कारण मतदाता सूची में भारी फेरबदल की शिकायतें आती रहती हैं। SIR प्रक्रिया के दौरान एक ही पते पर कई-कई आवेदनों का आना, फर्जी दस्तावेजों के सहारे नाम दर्ज कराना या किसी क्षेत्र विशेष के मतदाताओं का नाम अचानक गायब हो जाना जैसी आशंकाएं बनी रहती हैं।
अब मैदान में उतरकर की जा रही इस सीधी जांच से न केवल मतदाता सूची की पारदर्शिता (Transparency) सुनिश्चित होगी, बल्कि आगामी चुनावों के लिए एक स्वच्छ और त्रुटिरहित वोटर लिस्ट भी तैयार हो सकेगी। साफ है कि अगले 15 दिन उत्तराखंड प्रशासनिक अमले के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण रहने वाले हैं, जहां SIR का असली टेस्ट फाइलों में नहीं, बल्कि जमीनी बूथों पर होगा।