हरिद्वार।उत्तराखंड के धार्मिक शहर हरिद्वार से एक सनसनीखेज खबर सामने आई है। देश के सबसे चर्चित और भयावह मामलों में शामिल रहे नोएडा निठारी कांड से बरी हो चुके सुरेंद्र कोली ने हरिद्वार में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। वह यहां भूपतवाला इलाके में अपनी असली पहचान छिपाकर रह रहा था और एक मंदिर के सामने चाय का खोखा चलाकर अपना जीवन यापन कर रहा था। शव मिलने के बाद जब पुलिस ने जेब की तलाशी ली, तब जाकर उसकी असली पहचान उजागर हुई।

गुमनामी के अंधेरे में जी रहा था सुरेंद्र कोली
प्राप्त जानकारी के अनुसार, करीब तीन महीने पहले सुरेंद्र कोली हरिद्वार आया था। वह अपनी पुरानी पहचान और अतीत से दूर भागकर यहां बिल्कुल अलग नाम ‘सदाराम’ से रह रहा था। शुरुआती दिनों में वह मुस्तफाबाद गांव में ठहरा और फिर रोशनाबाद क्षेत्र में आ गया। रोशनाबाद में रहने के दौरान उसकी मुलाकात धर्मेंद्र नाम के व्यक्ति से हुई। चार दिन पहले ही धर्मेंद्र की मदद से उसने अनिल शर्मा नाम के व्यक्ति से लालमाता मंदिर के सामने चाय का एक खोखा किराए पर लिया था।
आसपास के लोग या दुकान मालिक कोई भी यह नहीं जानता था कि सदाराम के नाम से चाय बेचने वाला शख्स वास्तव में बहुचर्चित निठारी कांड का मुख्य आरोपी रह चुका सुरेंद्र कोली है। जब शुक्रवार को दुकान के भीतर उसका शव लटकता मिला, तो पूरे इलाके में हड़कंप मच गया और घटनास्थल पर लोगों की भारी भीड़ जमा हो गई।

दो आधार कार्ड और असली पहचान का खुलासा
स्थानीय लोगों की सूचना पर नगर कोतवाली पुलिस तुरंत मौके पर पहुंची और शव को कब्जे में लिया। जांच और पहचान की प्रक्रिया के दौरान जब पुलिसकर्मियों ने मृतक की जेब की तलाशी ली, तो उनके होश उड़ गए। उसकी जेब से दो अलग-अलग आधार कार्ड बरामद हुए। एक आधार कार्ड पर ‘सदाराम पुत्र शंकर’ लिखा हुआ था, जबकि दूसरे आधार कार्ड पर उसका असली नाम ‘सुरेंद्र कोली पुत्र शंकर कोली, निवासी डी-5, सेक्टर-31, नोएडा, गौतमबुद्ध नगर’ अंकित था।
मूल रूप से उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के भिकियासैंण का रहने वाला सुरेंद्र कोली वर्षों पहले रोजगार की तलाश में नोएडा गया था। हरिद्वार में अपनी पहचान गुप्त रखने के उद्देश्य से ही वह फर्जी नाम का सहारा ले रहा था।

पारिवारिक कलह और आर्थिक तंगी बनी वजह!
पुलिस की प्राथमिक जांच में आत्महत्या के पीछे पारिवारिक कलह और आर्थिक तंगी की बात सामने आ रही है। स्थानीय परिचित धर्मेंद्र से पूछताछ में पता चला कि सुरेंद्र के परिवार में बच्चे के जन्मदिन को लेकर विवाद चल रहा था। इसके अलावा वह काफी समय से गंभीर आर्थिक तंगी से भी जूझ रहा था। चाय की दुकान शुरू करने से महज 15 दिन पहले तक वह सिडकुल इलाके में एक सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी कर रहा था, जिसे छोड़कर उसने चाय का खोखा खोला था।
निठारी कांड से सुप्रीम कोर्ट तक का सफर
साल 2005 और 2006 के दौरान नोएडा के सेक्टर-31 स्थित डी-5 कोठी के पीछे नाले से 19 बच्चों और युवतियों के कंकाल मिले थे, जिसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। इस कोठी के मालिक मोनिंदर सिंह पंढेर के यहां सुरेंद्र कोली कुक और देखरेख का काम करता था। मामले की जांच सीबीआई को सौंपी गई थी और 2009 में गाजियाबाद सीबीआई कोर्ट ने दोनों को फांसी की सजा सुनाई थी।
लंबी कानूनी लड़ाई के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने बीते वर्ष 2025 में साक्ष्यों के अभाव और संदेह का लाभ देते हुए सुरेंद्र कोली और मोनिंदर सिंह पंढेर दोनों को निर्दोष करार देकर बरी कर दिया था। जेल से रिहा होने के बाद वह शांत और गुमनाम जिंदगी बिताना चाहता था, लेकिन आखिरकार उसकी जिंदगी का अंत इस दुखद मोड़ पर हुआ।

पुलिस जांच जारी
क्षेत्रीय पुलिस अधिकारी शिशुपाल सिंह नेगी ने बताया कि शव का पोस्टमार्टम कराया जा रहा है। मौके से मिले साक्ष्यों और आसपास के लोगों के बयानों के आधार पर मामले की गहनता से जांच की जा रही है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही मौत के सही कारणों और समय की आधिकारिक पुष्टि हो सकेगी।