- दलहन उत्पादन में आत्मनिर्भरता हेतु उठाएं समुचित कदम’
- ’मुख्य सचिव ने दलहन के एमएसपी पर क्रय का प्रस्ताव केंद्र को भेजने के दिए निर्देश’
देहरादून।भारत सरकार की ‘दलहन उत्पादन में आत्मनिर्भरता’ योजना के तहत उत्तराखंड ने कृषि क्षेत्र में एक नए युग की शुरुआत की तैयारी कर ली है। राज्य में दालों के उत्पादन को बढ़ावा देने, पैदावार की गुणवत्ता सुधारने और किसानों को उनकी फसल का सही मूल्य दिलाने के लिए बहुस्तरीय कार्ययोजना पर काम शुरू हो चुका है।
सचिवालय सभागार में आयोजित उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक में राज्य में दलहन क्रांति लाने के लिए कई दूरगामी फैसले लिए गए। बैठक का मुख्य केंद्र बिंदु किसानों को सीधे बाज़ार से जोड़ना, न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर शत-प्रतिशत खरीद सुनिश्चित करना और नई कृषि तकनीकों को ज़मीन पर उतारना रहा।

MSP पर खरीद के लिए बनेगा ठोस प्रस्ताव, नैफेड और NCDC निभाएंगे मुख्य भूमिका
बैठक के दौरान निर्देश दिए गए कि राज्य में उत्पादित दालों की शत-प्रतिशत खरीद न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर करने के लिए नैफेड (NAFED) और राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (NCDC) के माध्यम से एक विशेष प्रस्ताव तैयार किया जाए। इस प्रस्ताव को त्वरित स्वीकृति के लिए केंद्र सरकार को भेजा जाएगा।
इस व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य किसानों को फसल का उचित मूल्य दिलाना और बिचौलियों के नेटवर्क को समाप्त कर एक पारदर्शी बाजार उपलब्ध कराना है। जब किसानों को अपनी फसल का निश्चित और बेहतर दाम मिलेगा, तब वे पारंपरिक फसलों की जगह दलहन की खेती की ओर अधिक प्रोत्साहित होंगे।
FPO को बढ़ावा देने के लिए बनेगा ‘विशेष सेल’
राज्य में संगठित खेती को बढ़ावा देने के लिए किसान उत्पादक संगठनों (FPO) पर विशेष ध्यान केंद्रित किया जा रहा है। FPO को हर संभव सहायता और मार्गदर्शन देने के लिए एक ‘विशेष सेल’ (Special Cell) गठित करने का निर्णय लिया गया है।
संगठित किसान समूहों के माध्यम से न केवल कृषि उत्पादन बढ़ेगा, बल्कि:
- दालों की ग्रेडिंग और पैकेजिंग आसान होगी।
- स्थानीय स्तर पर प्रसंस्करण (Processing) और वैल्यू एडिशन (Value Addition) को बढ़ावा मिलेगा।
- विपणन (Marketing) का सीधा लाभ किसानों की जेब तक पहुंचेगा।
12 कुंतल प्रति हेक्टेयर उत्पादकता का महत्वाकांक्षी लक्ष्य
उत्तराखंड में वर्तमान दलहन पैदावार को बढ़ाकर 12 कुंतल प्रति हेक्टेयर तक ले जाने का कड़ा लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए बहुआयामी रणनीति अपनाई जाएगी:
- उन्नत बीजों का वितरण: किसानों को उच्च गुणवत्ता वाले प्रामाणिक बीज उपलब्ध कराए जाएंगे।
- आधुनिक कृषि तकनीक: पारंपरिक तरीकों की जगह आधुनिक तकनीकों और फसल प्रदर्शनों (Crop Demonstrations) का आयोजन होगा।
- तकनीकी मार्गदर्शन: वैज्ञानिकों और कृषि विशेषज्ञों द्वारा किसानों को सीधे खेतों तक जाकर प्रशिक्षण दिया जाएगा।
सेहत और अर्थव्यवस्था दोनों को मिलेगा नया जीवन
दालों के उत्पादन में वृद्धि केवल आर्थिक दृष्टिकोण से ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि यह राज्य की सामाजिक सेहत के लिए भी एक बड़ा कदम है। दालों के अधिक उत्पादन से प्रदेश में प्रोटीन की उपलब्धता बढ़ेगी। इससे नागरिकों के स्वास्थ्य में व्यापक सुधार होगा और एक स्वस्थ व सक्षम मानव संसाधन का निर्माण संभव हो सकेगा।
इसके साथ ही, स्थानीय स्तर पर पल्स प्रोसेसिंग यूनिट्स (Dal Processing Units) लगाने पर ज़ोर दिया जा रहा है, जिससे ग्रामीण इलाकों में रोज़गार के नए अवसर पैदा होंगे।
2025-26 से 2030-31 तक चलेगा 5 साल का रोडमैप
कृषि विभाग द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, केंद्र सरकार की यह दूरगामी परियोजना वर्ष 2025-26 से लेकर 2030-31 तक संचालित की जाएगी। उत्तराखंड सरकार ने इसके लिए 5 साल की विस्तृत कार्ययोजना तैयार कर केंद्र को भेज दी है।
तीन प्रमुख फसलों का चयन:
इस योजना के तहत राज्य में तीन मुख्य दलहनी फसलों पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा:
- उड़द (Urad)
- अरहर (Arhar/Toor)
- मसूर (Masoor)
बीज उत्पादन से लेकर क्लस्टर आधारित खेती और मूल्य संवर्धन (Value Addition) तक, यह परियोजना उत्तराखंड के किसानों को आत्मनिर्भर बनाने और उनकी आय दोगुनी करने में मील का पत्थर साबित होगी।
समीक्षा बैठक में कृषि एवं उद्यान विभाग, पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान और कृषि विश्वविद्यालयों के शीर्ष अधिकारी व विषय-विशेषज्ञ भी मौजूद रहे, जिन्होंने योजना के सफल क्रियान्वयन के लिए अपने महत्वपूर्ण सुझाव दिए।