उत्तरकाशी।उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले से एक बार फिर हिमालयी लोक-संस्कृति की अद्भुत तस्वीर सामने आई है। भटवाड़ी विकासखंड के प्रसिद्ध दयारा बुग्याल में 11,000 फीट की ऊंचाई पर पारंपरिक ‘अंढूड़ी उत्सव’ यानी मक्खन महोत्सव (बटर फेस्टिवल) का आयोजन बेहद धूमधाम से किया गया। मखमली घास के विशाल मैदानों में जब रंगों के बजाय दूध, दही और मक्खन से होली खेली गई, तो पूरा बुग्याल लोकउत्सव के रंग में रंग गया।
इस अनूठे पर्व में शामिल होने के लिए स्थानीय ग्रामीणों के साथ-साथ देश-विदेश से बड़ी संख्या में पर्यटक पहुंचे। चारों ओर ढोल-दमाऊं की गूंज और पारंपरिक वेशभूषा में थिरकते लोगों ने इस लोकपर्व को यादगार बना दिया।
देव डोलियों के आगमन के साथ शुरू हुआ अनुष्ठान
उत्सव की शुरुआत पौराणिक परंपराओं के अनुसार हुई। मां जगदंबा और क्षेत्र के इष्टदेव सोमेश्वर देवता की विशेष पूजा-अर्चना की गई। इसके बाद देव डोली की अगुवाई में रैथल, नटीन, बंदराणी और क्यारक गांव के लोग दयारा बुग्याल के लिए रवाना हुए।
पहाड़ी रास्तों को पार करते हुए जब ग्रामीणों और श्रद्धालुओं का जत्था बुग्याल पहुंचा, तो पूरा माहौल भक्ति और उत्साह से भर गया। यहां स्थित विशाल मैदानों में पूजा-अर्चना संपन्न कर सुख-समृद्धि की कामना की गई।
केमिकल वाले रंगों को अलविदा, दूध-मक्खन की ‘प्राकृतिक होली’
अंढूड़ी उत्सव का सबसे मुख्य और आकर्षक पहलू इसकी अनोखी होली है। आधुनिक दौर में जहां रासायनिक रंगों का चलन बढ़ा है, वहीं दयारा बुग्याल में सदियों पुरानी विशुद्ध परंपरा जीवित है।
उत्सव के लिए पशुपालकों और ग्रामीणों ने कई दिनों से दूध, दही, मट्ठा और मक्खन एकत्र किया था। देवताओं के पूजन के बाद लोगों ने एक-दूसरे के चेहरे पर मक्खन लगाया और छाछ-मट्ठे से होली खेली। मखमली हरी घास पर मक्खन से सराबोर लोग प्रकृति के प्रति अपने लगाव को दर्शाते नजर आए।
ढोल-दमाऊं की थाप पर रासौ और तांदी नृत्य का जादू
उत्सव का आकर्षण केवल मक्खन होली तक सीमित नहीं रहा। ढोल और दमाऊं की पारंपरिक ताल पर ग्रामीणों और पर्यटकों ने एक-दूसरे का हाथ थामकर प्रसिद्ध ‘रासौ’ और ‘तांदी’ नृत्य किया।
पहाड़ी लोकगीतों की धुनों ने 11 हजार फीट की ऊंचाई पर समां बांध दिया। विदेशी सैलानी भी खुद को रोक नहीं पाए और स्थानीय लोगों के साथ कदम से कदम मिलाकर थिरकते दिखे।
मनोरंजन नहीं, प्रकृति और पशुधन के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक
हिमालयी क्षेत्रों में ‘अंढूड़ी उत्सव’ का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व बहुत गहरा है। यह केवल एक मनोरंजन मेला नहीं, बल्कि प्रकृति और पशुधन (मवेशियों) के प्रति आभार व्यक्त करने का एक जरिया है।
गर्मियों के मौसम में ग्रामीण अपने पशुओं को लेकर दयारा बुग्याल के ऊंचे मैदानों में प्रवास करते हैं। वहां की समृद्ध घास से पशुधन को भरपूर पोषण मिलता है और दूध-मक्खन की पैदावार बढ़ती है। मानसून के अंत में जब ग्रामीण वापस लौटने की तैयारी करते हैं, तब भगवान और बुग्यालों को धन्यवाद देने के लिए यह उत्सव मनाया जाता है।
उत्तराखंड की समृद्ध जीवनशैली की झलक
दयारा बुग्याल में आयोजित यह बटर फेस्टिवल उत्तराखंड की उस समृद्ध परंपरा को दर्शाता है, जो पर्यावरण संरक्षण और सह-अस्तित्व का संदेश देती है। आधुनिकता के इस दौर में भी अपनी जड़ों से जुड़े रहना और प्राकृतिक संसाधनों का सम्मान करना इस उत्सव की मूल भावना है।
क्या कहते हैं आयोजक?
बटर फेस्टिवल मेला समिति के अध्यक्ष मनोज राणा ने बताया कि अंढूड़ी उत्सव हमारी पौराणिक धरोहर है। जिस तरह से इस बार स्थानीय लोगों के साथ देश-विदेश से पर्यटक पहुंचे हैं, उससे हमारी लोक-संस्कृति को वैश्विक पहचान मिल रही है। यह पर्व हमारी आने वाली पीढ़ियों को प्रकृति और संस्कृति से जोड़ने का एक मजबूत माध्यम है।
रिपोर्ट:कीर्ति निधि सजवान,उत्तरकाशी।