हरिद्वार/हल्द्वानी: उत्तराखंड के टिहरी जनपद अंतर्गत देवल गांव में 8 जून को 12वीं कक्षा के छात्र नवयुवक केतन लाल की जातिवादी दंभ के चलते निर्मम हत्या कर दी गई। इस जघन्य हत्याकांड के खिलाफ पूरे राज्य में भारी जन-आक्रोश भड़क उठा है। हरिद्वार से लेकर हल्द्वानी तक विभिन्न सामाजिक, छात्र और श्रमिक संगठनों ने सड़कों पर उतरकर तीखा विरोध प्रदर्शन किया और जातिवाद तथा सामंती मानसिकता का पुतला फूंका। प्रदर्शनकारियों ने आरोपी ताकतों को कड़ी से कड़ी सजा देने की मांग उठाई है।

प्रेम करने की मिली खौफनाक सजा, बर्बरता की हदें पार
प्राप्त विवरण के अनुसार, नवयुवक केतन लाल का कसूर सिर्फ इतना था कि उसने एक कथित उच्च जाति की लड़की से मित्रता और प्रेम किया था। इसी रंजिश के चलते उसे एक साजिश के तहत रात के समय बुलाया गया। आरोप है कि रातभर बंधक बनाकर उसके साथ बर्बरता की गई, शरीर पर कीलें ठोंकी गईं और जलाने के निशान भी पाए गए। इस हमले में केतन के मित्र दिवाकर डिमरी को भी पीट-पीटकर गंभीर रूप से घायल कर दिया गया। यह पूरी घटना समाज में गहरे धंसे जातीय जहर और ‘ऑनर किलिंग’ (सम्मान के नाम पर हत्या) की भयावह हकीकत को उजागर करती है।
हरिद्वार में संयुक्त मोर्चा का प्रदर्शन: फासीवादी और सामंती सोच पर प्रहार
हरिद्वार के बीएचईएल (BHEL) सेक्टर चार चौराहे पर संयुक्त संघर्षशील ट्रेड यूनियन मोर्चा के बैनर तले कई संगठनों ने सामूहिक रूप से विरोध प्रदर्शन किया। भेल मजदूर ट्रेड यूनियन के अध्यक्ष राज किशोर ने प्रदर्शन को संबोधित करते हुए कहा कि केतन लाल की हत्या जातिवादी जहर का नतीजा है, जिसे केवल वैज्ञानिक सोच और रूढ़िवादी ताकतों के खात्मे के माध्यम से ही समाज से दूर किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि आज के आधुनिक दौर में भी ऐसी सामंती घटनाएं बेहद शर्मनाक हैं।
इंकलाबी मजदूर केंद्र के सचिव पंकज कुमार ने मौजूदा राजनीतिक और सामाजिक माहौल पर चिंता जताते हुए कहा कि समाज में जातीय और सांप्रदायिक वैमनस्य फैलाया जा रहा है। समानता का अधिकार मांगने वाले दलित समाज को सामंती ताकतें बर्दाश्त नहीं कर पा रही हैं। यह रवैया पूरे समाज को मध्ययुगीन सामंती बर्बरता की ओर धकेल रहा है।

सरकारी आंकड़ों और सामाजिक समीक्षा के अनुसार, उत्तराखंड में साल 2023 में 123 और साल 2024 में 114 जातीय हिंसा की घटनाएं आधिकारिक तौर पर दर्ज की गईं। यह आंकड़े साबित करते हैं कि शांत दिखने वाले पहाड़ी प्रदेश में भी जातीय नफरत की जड़ें कितनी गहरी हो चुकी हैं।
हल्द्वानी के बुद्ध पार्क में गूंजे नारे, सरकारों की विफलता पर उठाए सवाल
परिवर्तनकामी छात्र संगठन के आह्वान पर हल्द्वानी के तिकोनिया स्थित बुद्ध पार्क में एक विशाल जनसभा का आयोजन किया गया, जिसका संचालन महेश ने किया। वक्ताओं ने राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के डरावने आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि साल 2024 में देश भर में दलित उत्पीड़न और जातीय हिंसा के 55,698 मामले दर्ज हुए। एक बड़ी संख्या उन मामलों की भी है जो थानों तक पहुंच ही नहीं पाते। वक्ताओं ने कहा कि इतनी बड़ी संख्या में लगातार हो रही घटनाएं न केवल एक सामाजिक कलंक हैं, बल्कि यह देश की राजनीतिक और प्रशासनिक विफलता को भी साफ दर्शाती हैं।
क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन के संयोजक नासिर अहमद ने याद दिलाया कि उत्तराखंड में यह पहली घटना नहीं है। इससे पहले कुमाऊं के अल्मोड़ा में दलित युवक जगदीश की भी एक तथाकथित उच्च जाति की लड़की से विवाह करने पर लड़की के परिजनों ने पीट-पीटकर निर्मम हत्या कर दी थी। इसी तरह टिहरी में एक शादी समारोह के दौरान केवल कुर्सी पर साथ बैठकर खाना खाने के कारण एक अन्य दलित युवक को मौत के घाट उतार दिया गया था। चंपावत में भी टैक्सी चालक की बेरहमी से पिटाई का ताजा मामला सामने आया है।

बराबरी और एकजुटता की मांग, गीतों के साथ हुआ समापन
प्रगतिशील महिला एकता केंद्र की प्रतिनिधि प्रीति ने कहा कि यह फासीवादी और सामंती मानसिकता पूरी तरह से महिलाओं और मानवाधिकारों के खिलाफ है। आधुनिक युग में जीने का दावा करने वाले समाज को अपनी इन प्रवृत्तियों को बदलना होगा, तभी एक प्रगतिशील समाज का निर्माण संभव है। छात्र और युवा संगठनों ने आह्वान किया कि नौजवान समाज की इन रूढ़िवादी बंदिशों को तोड़कर आगे बढ़ रहे हैं, इसलिए देश के न्यायप्रिय नागरिकों, छात्रों और युवाओं को संगठित होकर इस भेदभाव के खिलाफ प्रतिरोध खड़ा करना होगा।
इस राज्यवादी विरोध प्रदर्शन में परिवर्तनकामी छात्र संगठन, क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन, भीम आर्मी, आजाद समाज पार्टी, मूल निवासी संघ, अम्बेडकर मिशन, क्रांतिकारी किसान मंच, किर्बी श्रमिक कमेटी के कृष्णा मुरारी, नरेश, भवन, फूड्स श्रमिक यूनियन के देवेंद्र, तरुण, जय प्रकाश, अवधेश, नीशू और कई सामाजिक कार्यकर्ता शामिल रहे। कार्यक्रम का समापन “हजारों सालों से गुलामी बेड़ियां” गीत गाकर किया गया, जिसमें जातिवाद को जड़ से उखाड़ फेंकने का संकल्प लिया गया।