उत्तराखंड वोटर लिस्ट पुनरीक्षण: 19 लाख से अधिक मतदाताओं को निर्वाचन आयोग का नोटिस, राजनीतिक गलियारों में मचा बवाल
देहरादून। उत्तराखंड में विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया के पहले चरण के सफल समापन के बाद अब दूसरा चरण शुरू हो गया है। इस दूसरे चरण की शुरुआत के साथ ही राज्य की राजनीति में बड़ा भूचाल आ गया है। मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार, राज्य के कुल 71.33 लाख मतदाताओं में से लगभग 27 प्रतिशत यानी 19,04,380 मतदाताओं की दी गई जानकारियों में गंभीर त्रुटियां और विसंगतियां पाई गई हैं। चुनाव आयोग ने इन सभी 19 लाख से अधिक मतदाताओं को कारण बताओ नोटिस जारी कर जवाब मांगा है, ताकि मतदाता सूची को पूरी तरह से शुद्ध और त्रुटिरहित बनाया जा सके।
नोटिस जारी होते ही राज्य में सियासी बयानबाजी तेज हो गई है। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने इस कदम की कड़ी आलोचना करते हुए इसे मतदाताओं को डराने का प्रयास और पश्चिम बंगाल जैसा मॉडल करार दिया है। दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी और राज्य सरकार ने इसे केवल एक सामान्य प्रशासनिक और संवैधानिक पुनरीक्षण प्रक्रिया बताया है।
जांच शिविरों का आयोजन और नोटिस प्रक्रिया
ड्राफ्ट मतदाता सूची में उजागर हुई व्यापक गड़बड़ियों को देखते हुए निर्वाचन आयोग ने पारदर्शी समाधान की योजना बनाई है। नोटिस के बाद मिलने वाले जवाबों की निष्पक्ष सुनवाई के लिए न्याय पंचायत स्तर पर क्लस्टर कैंप लगाए जाएंगे। इसके अलावा मैदानी क्षेत्रों के निवासियों, नौकरीपेशा लोगों और बुजुर्गों की सुविधा के लिए तहसील परिसरों, नगर निगम, नगर पालिका, नगर पंचायत और वार्ड स्तर पर विशेष सत्यापन शिविर आयोजित करने के निर्देश दिए गए हैं।
क्यों भेजे गए 19 लाख मतदाताओं को नोटिस? ये हैं 8 मुख्य कारण
मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय द्वारा स्पष्ट किया गया है कि किसी भी नागरिक का नाम बेवजह नहीं हटाया जा रहा है। नोटिस मुख्य रूप से 8 प्रमुख तकनीकी एवं जनसांख्यिकी विसंगतियों (Demographic Discrepancies) के आधार पर जारी किए गए हैं:
- आयु अंतर में विसंगति: मतदाता और उसके माता-पिता के बीच की आयु का अंतर 15 वर्ष से कम दर्ज होना।
- अत्यधिक आयु अंतर: मतदाता तथा माता-पिता के बीच उम्र का फासला 50 वर्ष से अधिक दर्ज होना।
- पीढ़ीगत आयु त्रुटि: मतदाता और उसके दादा-दादी या नाना-नानी के बीच उम्र का अंतर 40 वर्ष से कम होना।
- सगे भाई-बहनों की उम्र में गड़बड़ी: दो सगे भाइयों या भाई-बहन के बीच जन्म का अंतर 9 महीने से कम दर्शाया जाना।
- अत्यधिक संतान प्रविष्टि: एक ही मुख्य मतदाता के साथ प्रोजेनी (संतति) के रूप में 6 से अधिक सदस्य जुड़े होना।
- नाम और संबंध संबंधी त्रुटियां: मतदाता या उनके संबंधियों के नाम तथा सरनेम की वर्तनी में गंभीर अशुद्धियां।
- खुद के नाम की स्पेलिंग त्रुटि: मतदाता के स्वयं के नाम में दर्ज गलतियां।
- अनमैप्ड रिकॉर्ड: पिछली एसआईआर की मुख्य मतदाता सूची में रिकॉर्ड का मैपिंग रहित होना।
उत्तराखंड के सभी 13 जिलों का जिलावार आंकड़ा
राज्य के सबसे बड़े आबादी वाले मैदानी जिलों में त्रुटियों का प्रतिशत सबसे अधिक पाया गया है। देहरादून में सर्वाधिक 33 प्रतिशत और हरिद्वार में 31 प्रतिशत मतदाताओं की जानकारी में विसंगतियां मिली हैं।
- देहरादून: 11,90,805 कुल मतदाता | 3,95,868 नोटिस (33%)
- हरिद्वार: 12,46,219 कुल मतदाता | 3,90,312 नोटिस (31%)
- उधम सिंह नगर: 11,55,672 कुल मतदाता | 3,36,164 नोटिस (29%)
- नैनीताल: 6,93,325 कुल मतदाता | 1,88,054 नोटिस (27%)
- उत्तरकाशी: 2,24,417 कुल मतदाता | 55,976 नोटिस (25%)
- टिहरी गढ़वाल: 4,63,628 कुल मतदाता | 1,04,402 नोटिस (23%)
- रुद्रप्रयाग: 1,80,786 कुल मतदाता | 42,469 नोटिस (23%)
- चम्पावत: 1,88,924 कुल मतदाता | 44,315 नोटिस (23%)
- पौड़ी गढ़वाल: 5,03,468 कुल मतदाता | 1,05,945 नोटिस (21%)
- पिथौरागढ़: 3,41,497 कुल मतदाता | 70,065 नोटिस (21%)
- बागेश्वर: 2,00,919 कुल मतदाता | 40,998 नोटिस (20%)
- चमोली: 2,72,187 कुल मतदाता | 52,246 नोटिस (19%)
- अल्मोड़ा: 4,71,938 कुल मतदाता | 77,566 नोटिस (16%)
राजनीतिक संग्राम: कांग्रेस ने उठाए सवाल, सरकार का पलटवार
19 लाख से अधिक नोटिस जारी होने पर राज्य की राजनीति गरमा गई है। कांग्रेस पार्टी ने आरोप लगाया है कि यह कानूनी कार्रवाई का खौफ दिखाकर आम जनता को मताधिकार से वंचित करने की साजिश है। कांग्रेस प्रवक्ताओं का कहना है कि सरकार यह माहौल बना रही है जिससे लोग डर के मारे नोटिस का जवाब न दें और अपने घरों में बैठ जाएं, जिससे उनका वोट कट जाए। विपक्षी दल का दावा है कि उत्तराखंड में भी पश्चिम बंगाल जैसा राजनीतिक खेल दोहराने का प्रयास किया जा रहा है। कांग्रेस नेतृत्व ने कार्यकर्ताओं का आह्वान किया है कि एक-एक वोट की रक्षा करना पार्टी का दायित्व है और वे राज्य में ऐसा मॉडल लागू नहीं होने देंगे।
वहीं दूसरी तरफ सत्ता पक्ष ने विपक्ष के आरोपों को बेबुनियाद बताया है। सरकार का स्पष्ट कहना है कि यह निर्वाचन आयोग की नियमित और पारदर्शी शुद्धिकरण प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया का उद्देश्य फर्जी वोटों को हटाना, मृत व्यक्तियों के नाम सूची से पृथक करना और जो लोग विवाह के बाद अन्यत्र चले गए हैं या दूसरे राज्यों/शहरों में बस गए हैं, उनके नाम दुरुस्त करना है। आयोग का प्रयास केवल वैध और वास्तविक नागरिकों को ही अंतिम मतदाता सूची में बनाए रखना है।
सत्यापन के लिए आयोग द्वारा मान्य 12 मुख्य दस्तावेज
नोटिस मिलने पर मतदाताओं को अपने फॉर्म के सत्यापन हेतु आयोग द्वारा निर्धारित निम्नलिखित आधिकारिक प्रमाण पत्रों में से कोई एक प्रस्तुत करना अनिवार्य होगा:
- केंद्र/राज्य सरकार या सार्वजनिक उपक्रम (PSU) के नियमित कर्मचारी/पेंशनभोगी पहचान पत्र या पेंशन भुगतान आदेश।
- 1 जुलाई 1987 से पूर्व सरकार, स्थानीय प्राधिकारी, बैंक, डाकघर, एलआईसी या पीएसयू द्वारा जारी दस्तावेज/पहचान पत्र।
- सक्षम प्राधिकारी द्वारा निर्गत आधिकारिक जन्म प्रमाण पत्र।
- वैध पासपोर्ट।
- मान्यता प्राप्त शिक्षा बोर्ड या विश्वविद्यालय द्वारा जारी मैट्रिकुलेशन/शैक्षणिक प्रमाण पत्र।
- सक्षम राज्य प्राधिकारी द्वारा जारी स्थायी निवास प्रमाण पत्र (Permanent Resident Certificate)।
- वन अधिकार प्रमाण पत्र (Forest Rights Certificate)।
- सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC), अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) या जाति प्रमाण पत्र।
- राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (जहां लागू हो)।
- राज्य/स्थानीय प्राधिकारियों द्वारा विधिवत तैयार किया गया परिवार रजिस्टर।
- सरकार द्वारा जारी भूमि या मकान आवंटन प्रमाण पत्र।
- आयोग के प्रासंगिक दिशा-निर्देशों एवं पत्रों के तहत निर्धारित आधार संबंधी नियम लागू होंगे।