रामनगर / कालागढ़:मानसून की भारी बारिश और जंगलों में कम दृश्यता का फायदा उठाकर सक्रिय होने वाले शिकारियों और असमाजिक तत्वों के मंसूबों पर पानी फेरने के लिए वन विभाग ने ‘ऑपरेशन मॉनसून’ के तहत कॉर्बेट टाइगर रिजर्व की दक्षिणी सीमा को पूरी तरह से सील कर दिया है। कॉर्बेट टाइगर रिजर्व (सीटीआर), अमानगढ़ टाइगर रिजर्व और तराई पश्चिमी वन प्रभाग की संयुक्त टीमों ने अंतर-प्रांतीय और सीमावर्ती इलाकों में एक व्यापक फ्लैग मार्च निकालकर सुरक्षा व्यवस्था का कड़ा संदेश दिया है।
यह पूरा अभियान फील्ड डायरेक्टर डा० साकेत बडोला के दिशानिर्देशों के तहत कालागढ़ के उप प्रभागीय वनाधिकारी बिंदर पाल की अगुवाई में चलाया गया। इसमें ढेला, झिरना, कालागढ़ और केहरीपुर (अमानगढ़) रेंज के दस्तों ने एक साथ गश्त की।

मानसून में कॉर्बेट की सुरक्षा सबसे बड़ी चुनौती
मानसून के दौरान जंगलों की भौगोलिक स्थिति काफी बदल जाती है। नदी-नाले उफान पर आ जाते हैं, गश्ती रास्ते (बटिया) टूट जाते हैं और घनी झाड़ियों के कारण जंगलों के भीतर देखना बेहद मुश्किल हो जाता है। ऐसी स्थिति का लाभ उठाकर अवैध शिकारी और लकड़ी तस्कर जंगलों में घुसपैठ की कोशिश करते हैं। इसी खतरे को भांपते हुए वन विभाग ने नियमित गश्त से इतर संयुक्त ‘सुरक्षा घेरा’ तैयार किया है, ताकि सीमावर्ती इलाकों से लेकर अंदरूनी हिस्सों तक परिंदा भी पर न मार सके।

गुर्जर डेरों और संवेदनशील चौकियों की औचक जांच
अभियान का आगाज ढेला रेंज स्थित वन विश्राम भवन से हुआ। उप प्रभागीय वनाधिकारी बिंदर पाल ने गश्ती दस्तों को रूट प्लान की जानकारी देते हुए सुरक्षा प्रोटोकॉल समझाए। इसके बाद अधिकारियों और कर्मचारियों का काफिला ढेला क्षेत्र के चौफुला गुर्जर डेरे पहुँचा।
वहाँ डेरों में मौजूद लोगों की सघन चेकिंग की गई और संदिग्धों से पूछताछ की गई। इसके बाद गश्ती दल बजरी रोड और फीका नदी के तटीय इलाकों से होते हुए पत्थर कुआँ गुर्जर डेरा पहुँचा। कालू सिद्ध मजार, झुल्लूमोड़, पतरामपुर और बादीगढ़ जैसे बेहद संवेदनशील और घुसपैठ की दृष्टि से जोखिम भरे रास्तों को खंगालते हुए यह फ्लैग मार्च अमानगढ़ टाइगर रिजर्व के केहरीपुर रेंज कार्यालय पहुँचा।

इंटेलिजेंस नेटवर्क मजबूत करने पर जोर: ग्रामीणों को बनाया ‘आई एंड ईयर’
जंगल की सुरक्षा केवल हथियारों या गश्त से संभव नहीं है, इसके लिए स्थानीय मुखबिर तंत्र (इंटेलिजेंस) की सबसे ज्यादा जरूरत होती है। इसी रणनीति के तहत फ्लैग मार्च के दौरान टीम ने धारा, कल्लूवाला, मीरापुर और भिक्कावाला जैसे सीमावर्ती गांवों का रुख किया।
वहाँ अधिकारियों ने ग्रामीणों और स्थानीय जनप्रतिनिधियों के साथ सीधी बैठकें कीं। वन विभाग ने ग्रामीणों को अपना ‘आंख और कान’ (Eye & Ear) बनने का आह्वान किया। ग्रामीणों को समझाया गया कि यदि सीमावर्ती इलाकों में कोई अज्ञात व्यक्ति, संदिग्ध वाहन या गतिविधि दिखे, तो उसकी सूचना तुरंत वन विभाग की कंट्रोल रूम को दें। इसके अलावा मानव-वन्यजीव संघर्ष को टालने के लिए जंगल के मुहाने पर न जाने की हिदायत भी दी गई।

डी-ब्रीफिंग में बनी आगे की रणनीति
गश्त का यह विस्तृत रूट तय करते हुए टीम कालागढ़ वन विश्राम भवन पहुंची, जहाँ उप प्रभागीय वनाधिकारी बिंदर पाल ने डी-ब्रीफिंग की। उन्होंने पूरे फ्लैग मार्च की समीक्षा करते हुए अधिकारियों को निर्देश दिए कि मानसून भर सुरक्षा व्यवस्था में किसी भी तरह की ढील न दी जाए।
सभी रेंजों और अलग-अलग प्रभागों के बीच रियल-टाइम सूचनाओं के आदान-प्रदान (Inter-departmental Coordination) को अनिवार्य किया गया है, ताकि किसी भी आपात स्थिति में तुरंत त्वरित कार्रवाई की जा सके।
अभियान में शामिल मुख्य अधिकारी
इस संयुक्त अभियान में उप प्रभागीय वनाधिकारी बिंदर पाल, ढेला वन क्षेत्राधिकारी नवीन चन्द्र पाण्डे, झिरना वन क्षेत्राधिकारी अभय जोशी, वन क्षेत्राधिकारी नन्द किशोर रूवाली, उपराजिक श्याम लाल, अमानगढ़ से वन दरोगा फूल सिंह, मदन मेहरा, तराई पश्चिमी (उत्तरी जसपुर) से वन आरक्षी विपिन कुमार, वन दरोगा सोहन सिंह पटवाल, रक्षित पाण्डे, सिद्धार्थ रावत, तथा वन आरक्षी मनवर सिंह, दयाल सिंह बिष्ट और राकेश दिवाकर समेत कई वनकर्मी तैनात रहे।