हल्द्वानी। नैनीताल जिले के हल्द्वानी से एक बड़ा मामला सामने आया है, जहाँ फर्जी और संदिग्ध जाति प्रमाण पत्र के सहारे सरकारी नौकरी पाने की कोशिश का पर्दाफाश हुआ है। जिला प्रशासन ने इस मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए बड़ी प्रशासनिक कार्रवाई की है। जिला स्तरीय स्क्रूटनी कमेटी की सिफारिशों और जांच रिपोर्ट के आधार पर होम्योपैथिक चिकित्साधिकारी के पद पर तैनात एक महिला डॉक्टर का अनुसूचित जाति (एससी) प्रमाण पत्र तत्काल प्रभाव से निरस्त कर दिया गया है।
प्रशासनिक जांच में यह बात साफ हुई है कि संबंधित डॉक्टर का मूल निवास हिमाचल प्रदेश में है और उन्होंने नियमों को ताक पर रखकर उत्तराखंड से दूसरा जाति प्रमाण पत्र बनवाया था। इस पूरी कार्रवाई के बाद स्वास्थ्य महकमे और प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मच गया है।
क्या है पूरा मामला?
पूरा मामला हल्द्वानी तहसील से जारी एक अनुसूचित जाति प्रमाण पत्र से जुड़ा हुआ है। डॉक्टर मनीषा कायथ का मूल निवास स्थान हिमाचल प्रदेश के सोलन जिले में है। रिकॉर्ड के अनुसार, कसौली तहसील (हिमाचल प्रदेश) से 11 अक्टूबर 1999 को उन्हें ‘छिब्बे’ जाति का अनुसूचित जाति प्रमाण पत्र जारी किया गया था।
हिमाचल का मूल निवासी होने के बावजूद, विवाह के बाद उन्होंने 22 जनवरी 2014 को हल्द्वानी तहसील से उत्तराखंड की ‘धोबी’ जाति के तहत एक और अनुसूचित जाति प्रमाण पत्र बनवा लिया। इसी दूसरे प्रमाण पत्र का इस्तेमाल करके उन्होंने उत्तराखंड चिकित्सा सेवा चयन बोर्ड की परीक्षा दी और उनका चयन राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) के तहत होम्योपैथिक चिकित्साधिकारी के पद पर हो गया। वर्तमान समय में वह चंपावत जिले के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, पाटी में संविदा पर अपनी सेवाएं दे रही थीं।
शिकायत के बाद स्क्रूटनी कमेटी ने शुरू की जांच
संदिग्ध दस्तावेजों के जरिए नौकरी हासिल करने की शिकायत मिलने पर नैनीताल जिला प्रशासन ने मामले को गंभीरता से लिया। जांच के लिए जिला स्तरीय स्क्रूटनी कमेटी का गठन किया गया। इस मामले की विस्तृत समीक्षा और सुनवाई के लिए 3 अगस्त 2026 को स्क्रूटनी कमेटी की एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई।
इस उच्च स्तरीय बैठक में अपर जिलाधिकारी (प्रशासन), सिटी मजिस्ट्रेट (हल्द्वानी), जिला समाज कल्याण अधिकारी (नैनीताल) और जिला होम्योपैथिक अधिकारी (चंपावत) मौजूद रहे। कमेटी ने तहसील स्तर के रिकॉर्ड, मूल निवास प्रमाणपत्र और आवेदिका के पक्ष का बारीकी से अध्ययन किया।
सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के फैसलों का हवाला
जांच प्रक्रिया के दौरान स्क्रूटनी कमेटी ने माननीय सुप्रीम कोर्ट के रंजना कुमारी बनाम स्टेट ऑफ उत्तरांचल और उत्तराखंड हाईकोर्ट के श्रीमती अंशु सागर बनाम स्टेट ऑफ उत्तराखंड के ऐतिहासिक न्यायिक फैसलों का गहराई से परीक्षण किया।
अदालती दिशा-निर्देशों और विधिक व्यवस्था के अनुसार, अनुसूचित जाति या जनजाति आरक्षण का लाभ केवल उसी राज्य की सरकारी सेवाओं में मिल सकता है, जहाँ का व्यक्ति मूल निवासी है। विवाह के आधार पर किसी दूसरे राज्य में जाने पर उस राज्य का आरक्षण लाभ नहीं लिया जा सकता। इस विधिक नियम के तहत कमेटी ने पाया कि सोलन (हिमाचल प्रदेश) की मूल निवासी होने के कारण उत्तराखंड से जारी किया गया प्रमाण पत्र पूरी तरह नियमों के विरुद्ध था।
प्रमाण पत्र जब्त करने और आगे की कार्रवाई के निर्देश
स्क्रूटनी कमेटी की स्पष्ट संस्तुति के बाद नैनीताल के जिलाधिकारी ललित मोहन रयाल ने हल्द्वानी तहसील से जारी अनुसूचित जाति प्रमाण पत्र को निरस्त करने के आदेश जारी कर दिए। साथ ही संबंधित तहसीलदार को इस अवैध प्रमाण पत्र को तुरंत जब्त करने के निर्देश दिए गए हैं।
जिला प्रशासन की ओर से संबंधित विभागों, विशेषकर स्वास्थ्य विभाग को आगे की कानूनी और प्रशासनिक कार्रवाई के लिए पत्र भेज दिए गए हैं। जिलाधिकारी ललित मोहन रयाल का कहना है कि नियमों और कानूनी प्रावधानों के उल्लंघन पर यह कार्रवाई की गई है और भविष्य में भी शासकीय व्यवस्था में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए नियमानुसार कड़े कदम उठाए जाते रहेंगे।