कॉर्बेट टाइगर रिजर्व: कालागढ़ वन्यजीव प्रशिक्षण केंद्र में वन आरक्षियों के लिए ‘हाथी गणना कार्यशाला’ आयोजित, सीखे मॉनिटरिंग के आधुनिक गुर
कालागढ़ (पौड़ी गढ़वाल/उत्तराखंड)। कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के अंतर्गत कॉर्बेट वन्यजीव प्रशिक्षण केंद्र, कालागढ़ में वन आरक्षी प्रशिक्षण-2026 (प्रथम सत्र) के प्रशिक्षार्थियों के लिए एक विशेष ‘हाथी गणना कार्यशाला’ का आयोजन किया गया। यह कार्यशाला निदेशक, कॉर्बेट वन्यजीव प्रशिक्षण केंद्र के निर्देशों के क्रम में आयोजित की गई, जिसका मुख्य उद्देश्य नए वन आरक्षियों को वन्यजीव प्रबंधन और हाथियों की वैज्ञानिक गणना की आधुनिक तकनीकों से अवगत कराना था। सुबह 10:30 बजे शुरू हुई यह कार्यशाला दोपहर 01:00 बजे तक चली, जिसमें प्रशिक्षार्थियों को फील्ड सर्वे से लेकर तकनीकी टूल्स के इस्तेमाल की विस्तृत जानकारी दी गई।
एम-स्ट्राइप्स इकोलॉजिकल ऐप और तकनीकी सत्र
कार्यशाला की शुरुआत में वनक्षेत्राधिकारी, कॉर्बेट वन्यजीव प्रशिक्षण केंद्र, कालागढ़ ने भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII), देहरादून के शोधकर्ताओं का स्वागत किया और प्रशिक्षार्थियों से उनका परिचय कराया। इसके बाद तकनीकी सत्रों की शुरुआत हुई। भारतीय वन्यजीव संस्थान के शोधकर्ता सुगन कोले ने प्रशिक्षार्थियों को ‘एम-स्ट्राइप्स इकोलॉजिकल ऐप’ (M-STrIPES Ecological App) के उपयोग के बारे में विस्तार से समझाया।
उन्होंने बताया कि फील्ड सर्वेक्षण के दौरान इस मोबाइल ऐप की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है। डिजिटल प्रेजेंटेशन के माध्यम से प्रशिक्षार्थियों को ऐप की यूजर गाइड और उपयोगिता की बारीकियों से रूबरू कराया गया। इस तकनीकी प्रशिक्षण के तहत हाथियों की सटीक पहचान, सर्वेक्षण का सही समय, सर्वेक्षण का वैज्ञानिक तरीका, कार्यप्रणाली और डेटा कलेक्शन की विधियों को बारीकी से समझाया गया।
हाथियों के शारीरिक लक्षणों के आधार पर पहचान की तकनीक
शोधकर्ता सुगन कोले ने एशियाई हाथियों के आकलन की व्यावहारिक पद्धतियों पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि आयु वर्ग के आधार पर हाथियों के शरीर का आकार, उनकी ऊंचाई और दांतों की उपस्थिति के जरिए किस प्रकार वर्गीकरण किया जाता है। इसके अलावा, फील्ड में अक्सर नजर आने वाले टस्कर (नर हाथी), मखना (बिना दांत वाला नर हाथी) और वयस्क मादा हाथी के बीच अंतर को स्पष्ट रूप से पहचानने के तरीके साझा किए गए।
सत्र को आगे बढ़ाते हुए भारतीय वन्यजीव संस्थान के एक अन्य शोधकर्ता धर्मराज सिंह ने हाथियों के विभिन्न शारीरिक अंगों के आधार पर उनकी पहचान करने के व्यावहारिक तरीके सिखाए। उन्होंने प्रेजेंटेशन के माध्यम से समझाया कि हाथियों के कान, माथा, सूंड, पीठ, पूंछ तथा पैरों के आकार और उन पर मौजूद विशिष्ट चिह्नों को देखकर उनकी व्यक्तिगत पहचान (Individual Identification) कैसे की जा सकती है। यह जानकारी वन आरक्षियों के लिए फील्ड ड्यूटी और गश्त के दौरान हाथियों की सटीक मॉनिकेटिंग करने में बेहद मददगार साबित होगी।
प्रशिक्षार्थियों ने सीखे वन्यजीव प्रबंधन के गुर
इस कार्यशाला में दी गई गहन और व्यावहारिक जानकारियों से सभी प्रशिक्षार्थी बेहद लाभान्वित हुए। वन आरक्षियों ने माना कि परंपरागत तरीकों के स्थान पर आधुनिक मोबाइल ऐप्स और वैज्ञानिक पद्धतियों के समन्वय से वन्यजीवों की सुरक्षा और गणना का काम अधिक सटीक और सुगम हो जाता है। कॉर्बेट टाइगर रिजर्व जैसे संवेदनशील और सघन वन्यजीव आबादी वाले क्षेत्र में इस प्रकार की कार्यशालाएं मैदानी स्टाफ की कार्यक्षमता और दक्षता को बढ़ाने में मील का पत्थर साबित होती हैं।
कार्यशाला के अंतिम चरण में प्रशिक्षु वन आरक्षी अमरपाल सिंह ने प्रशिक्षण केंद्र के अधिकारियों, मुख्य वक्ताओं और भारतीय वन्यजीव संस्थान के अतिथि संकाय सदस्यों का आभार व्यक्त किया। कार्यशाला के सफल संचालन में कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के मीडिया सेल और स्थानीय स्टाफ का विशेष सहयोग रहा।