रामनगर। उत्तराखंड में भूमि अधिकारों, वन ग्रामों के नियमितीकरण और मजदूर बस्तियों को मालिकाना हक दिलाने की मांग को लेकर व्यापक जनआंदोलन की तैयारी शुरू हो गई है। विभिन्न सामाजिक, राजनीतिक और महिला संगठनों ने संयुक्त रूप से आगामी 1 अक्टूबर को हल्द्वानी में विशाल प्रदर्शन आयोजित करने की घोषणा की है। प्रदर्शन के माध्यम से राज्य सरकार और केंद्र सरकार से वन अधिकार कानून 2006 के प्रभावी क्रियान्वयन, नजूल भूमि के नियमितीकरण तथा मलिन बस्ती अधिनियम 2016 के तहत मजदूर बस्तियों को वैध दर्जा देने की मांग उठाई जाएगी।
यह निर्णय पायते वाली रामलीला परिसर में आयोजित एक महत्वपूर्ण बैठक में लिया गया। बैठक में वन अधिकार कानून 2006 के तहत गठित ग्राम स्तरीय वनाधिकार समितियों के सदस्यों के साथ-साथ विभिन्न सामाजिक और जनसंगठनों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। सुंदरखाल, देवीचौड़ा खत्ता, बिंदुखत्ता, मानपुर, कालू सिद्ध तथा नई बस्ती पूछड़ी सहित विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिनिधियों ने भूमि अधिकारों के मुद्दे पर एकजुट होकर संघर्ष करने का संकल्प लिया।
बैठक को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने कहा कि उत्तराखंड की भूमि, जंगल और प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग स्थानीय जनता के हितों को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि वर्तमान में संसाधनों का लाभ बड़े कॉरपोरेट घरानों, होटल उद्योग और ठेकेदारों को अधिक मिल रहा है, जबकि स्थानीय समुदाय अपने पारंपरिक अधिकारों से वंचित हैं।

वक्ताओं ने मांग की कि राज्य के प्रत्येक गांव को अपने पारंपरिक वन एवं भूमि पर अधिकार प्रदान किया जाए। साथ ही स्थानीय लोगों की सहमति से गांव स्तर पर रोजगार आधारित विकास योजनाएं तैयार की जाएं ताकि युवाओं को अपने क्षेत्रों में ही रोजगार के अवसर उपलब्ध हो सकें।
बैठक में यह भी मांग उठाई गई कि मलिन बस्ती अधिनियम 2016 के तहत प्रदेश की सभी मजदूर बस्तियों का सर्वेक्षण कराया जाए। इसके बाद प्रत्येक बस्ती के निवासियों को मालिकाना हक दिया जाए अथवा उनकी सहमति से सम्मानजनक पुनर्वास की व्यवस्था की जाए। वक्ताओं ने शहरी रोजगार गारंटी योजना लागू करने तथा उसके माध्यम से किफायती आवास निर्माण को बढ़ावा देने की भी आवश्यकता जताई।
वन अधिकार कानून 2006 के प्रभावी क्रियान्वयन पर जोर देते हुए वक्ताओं ने कहा कि राज्य के सभी वन ग्रामों को राजस्व ग्राम का दर्जा दिया जाना चाहिए। साथ ही कानून के तहत पात्र लोगों के व्यक्तिगत एवं सामुदायिक वन अधिकारों को तत्काल मान्यता दी जानी चाहिए।
बैठक में यह मांग भी प्रमुखता से उठाई गई कि राज्य सरकार ऐसा कानून बनाए जिससे किसी भी नागरिक को बिना उचित प्रक्रिया के बेघर न किया जा सके। यदि किसी परिवार को किसी क्षेत्र से हटाना आवश्यक हो तो उससे संवाद स्थापित कर उसकी सहमति से पुनर्वास की समुचित व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।

बैठक के दौरान सामाजिक सरोकारों से जुड़े अन्य मुद्दों पर भी चर्चा हुई। प्रतिभागियों ने टिहरी में 18 वर्षीय अनुसूचित जाति के युवक की कथित ऑनर किलिंग की कड़े शब्दों में निंदा की। उपस्थित लोगों ने दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की मांग करते हुए समाज से जातिवाद जैसी बुराइयों को समाप्त करने का संकल्प लिया।
इसके अलावा भारत सरकार के एकमात्र आयुर्वेदिक एवं यूनानी औषधि निर्माण कारखाने के विनिवेश को रोकने की मांग भी उठाई गई। साथ ही जंगली जानवरों से फसलों, पशुधन और ग्रामीणों की सुरक्षा के लिए प्रभावी कदम उठाने की आवश्यकता पर जोर दिया गया।
बैठक में वन पंचायत संघर्ष मोर्चा, चेतना आंदोलन, महिला एकता मंच, महिला किसान संगठन तथा विभिन्न जनसंगठनों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। वक्ताओं ने कहा कि भूमि अधिकार, आवास सुरक्षा और प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय समुदायों के अधिकारों को लेकर संघर्ष आगे भी जारी रहेगा तथा 1 अक्टूबर का हल्द्वानी प्रदर्शन इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगा।