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क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन का हल्द्वानी में विशेष सेमिनार: एसआईआर और बनभूलपुरा के मुद्दे पर उठे गंभीर सवाल



हल्द्वानी। क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन द्वारा जलियांवाला बाग हत्याकांड की पूर्व संध्या पर हल्द्वानी में एक विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) पर सेमिनार का आयोजन किया गया। इस सेमिनार का उद्देश्य नागरिक अधिकारों और मजदूरों के मुद्दों को लेकर जागरूकता फैलाना था। कार्यक्रम की शुरुआत जलियांवाला बाग हत्याकांड के शहीदों को श्रद्धांजलि देने के लिए दो मिनट का मौन रखकर की गई, इसके बाद एक जन गीत “ज़माने को बदलना है ….” के साथ सेमिनार की शुरुआत हुई।

एसआईआर: एक विवादास्पद कदम
संगठन के केंद्रीय अध्यक्ष पी. पी. आर्या ने अपने उद्घाटन भाषण में एसआईआर की प्रक्रिया पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि यह दरअसल एक जटिल तरीके से देश में एनआरसी लागू करने की दिशा में एक कदम है। उन्होंने कहा कि “एसआईआर के नाम पर सरकार मज़दूरों, मेहनतकश जनता, और विशेषकर मुस्लिम समुदाय से मताधिकार छीनने की साजिश कर रही है।” इस पर काफी गंभीर चिंताएं उठाई जा रही हैं कि यह नागरिकता से संबंधित अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है।

मजदूरों की स्थिति पर चिंता व्यक्त
ठेका मजदूर कल्याण समिति के अभिलाख ने बताया कि देश में मजदूरों की स्थिति दिनों-दिन खराब होती जा रही है। वह कहते हैं, “मजदूर अब अपने कागजात की देख-रेख करें या फिर अपनी रोजी-रोटी बचाएं, यह बड़ा सवाल बन गया है।” उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सरकार डिटेंशन कैम्प बना कर मजदूरों को उनके अधिकारों से वंचित करने की कोशिश कर रही है। इस संदर्भ में, उन्होंने मजदूरों से संगठित होकर अपने अधिकारों की रक्षा करने की अपील की।

सामाजिक और राजनीतिक दृष्टिकोण
उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी के अमीन उर रहमान ने कहा कि एसआईआर के माध्यम से सरकार देश के मेहनतकश वर्ग को उनके जनवादी अधिकार से वंचित करने की कोशिश कर रही है। उन्होंने इस प्रक्रिया को एक “साजिश” के रूप में देखा, जो आम आदमी के लिए बहुत हानिकारक हो सकती है।

परिवर्तनकामी छात्र संगठन के उमेश पाण्डेय ने इस विषय पर जोर देते हुए कहा कि एनआरसी और एसआईआर के नाम पर देशभर में फर्जीवाड़ा हो रहा है। उनका मानना है कि यह केवल एक बहाना है, जिसके तहत सरकार देशभर में मेहनतकश लोगों को उनके अधिकारों से वंचित करना चाहती है।

पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का दृष्टिकोण
वरिष्ठ पत्रकार और संस्कृतिकर्मी उमेश तिवारी ने कहा, “आज इस रेत पर टिकी व्यवस्था का संकट बढ़ रहा है, और अब समय आ गया है कि मेहनतकश वर्ग एकजुट होकर बेहतरीन समाज का निर्माण करें।” उन्होंने समाज के विभिन्न वर्गों से इस मुद्दे पर आवाज उठाने का आह्वान किया।
इंकलाबी मजदूर केंद्र के पूर्व अध्यक्ष कैलाश भट्ट ने भी अपने विचार रखे और कहा कि कई लोग प्राकृतिक आपदाओं के कारण अपना घर, जमीन और रोजी-रोटी खो चुके हैं। वहीं, सामाजिक कार्यकर्ता तसलिम अंसारी ने सरकार की नीतियों को अंग्रेजों से भी बुरा बताते हुए कहा कि आज सरकार अपने ही लोगों के खिलाफ काम कर रही है, और एसआईआर के बहाने नागरिकों के वोट देने के अधिकार को छीनने की साजिश कर रही है।

महिलाओं के अधिकारों पर भी सवाल उठे
प्रगतिशील महिला एकता केंद्र की अध्यक्ष बिंदु गुप्ता ने महिला सुरक्षा को लेकर चिंता व्यक्त की। उनका कहना था कि एसआईआर के लागू होने के बाद, जब वंचित लोगों को डिटेंशन कैम्प में रखा जाएगा, तो वहां महिलाओं की सुरक्षा को लेकर कोई गारंटी नहीं है। यह समाज के लिए एक गंभीर मुद्दा है, जिसे जल्द हल किया जाना चाहिए।

हल्द्वानी के बनभूलपुरा बस्ती का मामला
सेमिनार में एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव हल्द्वानी की पुरानी रिहायशी बस्ती बनभूलपुरा को उजाड़ने के खिलाफ भी लिया गया। लंबे समय से यह बस्ती विभिन्न सरकारी योजनाओं और बहानों के तहत उजाड़ने की प्रक्रिया का सामना कर रही है। चाहे वह रेलवे स्टेशन विस्तार हो या गौला नदी पर पुल के टूटने का बहाना, हर बार इस बस्ती को उजाड़ने की कोशिश की जाती रही है। सेमिनार में इस बस्ती के पीड़ित परिवारों के साथ संवेदना व्यक्त करते हुए उनकी आवाज़ को बुलंद करने का संकल्प लिया गया।

मांगों के प्रस्ताव

सेमिनार में दो महत्वपूर्ण प्रस्ताव पास किए गए:
एसआईआर को निरस्त किया जाए।
हल्द्वानी की सबसे पुरानी बस्ती बनभूलपुरा को उजाड़ने के खिलाफ आंदोलन किया जाए।

यह सेमिनार इस बात का प्रतीक है कि देश के नागरिक और समाज के विभिन्न वर्ग एसआईआर और नागरिकता के मुद्दे पर सजग हैं और उनके अधिकारों की रक्षा के लिए हर संभव कदम उठाएंगे।

समाप्ति और अपील
सेमिनार के अंत में सभी उपस्थित लोगों ने इस मुद्दे पर अपनी एकजुटता का संकल्प लिया और नागरिकता के संवैधानिक अधिकारों के लिए संघर्ष करने की शपथ ली। इस कार्यक्रम में कई सामाजिक कार्यकर्ताओं, राजनीतिक नेताओं और आम नागरिकों ने हिस्सा लिया और अपने विचार व्यक्त किए। यह सेमिनार यह स्पष्ट करता है कि देश के नागरिकों को अपने अधिकारों के प्रति सजग रहना जरूरी है, ताकि वे किसी भी प्रकार की असंवैधानिक प्रक्रिया के शिकार न हो सकें।

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