हरियाणा।हरियाणा के गुरुग्राम-मानेसर औद्योगिक क्षेत्र में चल रहा मजदूर आंदोलन अब राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बनता जा रहा है। मजदूर संगठनों ने आरोप लगाया है कि आंदोलन को दबाने के लिए प्रशासन और कंपनी प्रबंधन की ओर से साजिश के तहत फर्जी मुकदमे दर्ज किए जा रहे हैं और मजदूर नेताओं को निशाना बनाया जा रहा है।
बताया जा रहा है कि 2 अप्रैल से मानेसर की विभिन्न कंपनियों में कार्यरत ठेका मजदूरों ने अपनी मांगों को लेकर विरोध प्रदर्शन शुरू किया था। यह आंदोलन धीरे-धीरे गुरुग्राम से निकलकर नोएडा, फरीदाबाद, पानीपत और बावल तक फैल गया। मजदूरों की प्रमुख मांगों में वेतन वृद्धि, ओवरटाइम का डबल भुगतान और न्यूनतम वेतन लागू करने की मांग शामिल है।
मजदूर संगठनों का कहना है कि वर्तमान में उन्हें न्यूनतम वेतन से भी कम भुगतान किया जा रहा है और ओवरटाइम के नियमों का पालन नहीं किया जा रहा। इसके साथ ही ठेका प्रथा के जरिए श्रमिकों का शोषण किया जा रहा है, जिसे उन्होंने “अनफेयर लेबर प्रैक्टिस” बताया है।
9 अप्रैल को क्या हुआ?
9 अप्रैल को आंदोलन ने उस समय हिंसक मोड़ ले लिया जब प्रदर्शन के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव हो गया। मजदूर संगठनों का आरोप है कि पुलिस ने लाठीचार्ज किया, जिसमें बड़ी संख्या में मजदूर घायल हुए। वहीं, कुछ जगहों पर आगजनी और तोड़फोड़ की घटनाएं भी सामने आईं।
पुलिस ने इस मामले में कई एफआईआर दर्ज की हैं। इनमें सरकारी काम में बाधा डालने, अवैध सभा, दंगा, आगजनी और हत्या के प्रयास जैसी गंभीर धाराएं शामिल की गई हैं। रिपोर्ट के अनुसार, इस कार्रवाई में 50 से अधिक मजदूरों को गिरफ्तार किया गया, जिनमें कई महिला मजदूर भी शामिल हैं।
कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी
मजदूर संगठनों के कई पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं को भी हिरासत में लिया गया है। आरोप है कि पुलिस ने कुछ लोगों को रात में उनके घरों से उठाया और बिना पर्याप्त सबूत के उनके खिलाफ कार्रवाई की। गिरफ्तार किए गए लोगों में यूनियन से जुड़े कई सक्रिय सदस्य शामिल बताए जा रहे हैं।
संगठनों का कहना है कि इन गिरफ्तारियों के जरिए मजदूर आंदोलन को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है। साथ ही, यह भी आरोप लगाया गया कि पुलिस ने सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों पर भी निगरानी बढ़ा दी है और आंदोलन से जुड़े लोगों को चिन्हित कर कार्रवाई की जा रही है।
मजदूर संगठनों के आरोप
इंकलाबी मजदूर केंद्र और अन्य संगठनों ने आरोप लगाया है कि यह पूरी कार्रवाई एक सुनियोजित साजिश के तहत की जा रही है, ताकि मजदूरों की एकता को तोड़ा जा सके। उनका कहना है कि कंपनियों और प्रशासन की मिलीभगत से मजदूर नेताओं पर गंभीर धाराओं में मुकदमे दर्ज किए जा रहे हैं।
संगठनों ने यह भी कहा कि पहले भी मानेसर में इसी तरह के मामलों में मजदूरों और यूनियन नेताओं को लंबे समय तक जेल में रखा गया है। ऐसे में मौजूदा घटनाएं उसी पैटर्न को दोहराने की कोशिश लगती हैं।
प्रमुख मांगें
मजदूर संगठनों ने सरकार के सामने कई मांगें रखी हैं, जिनमें—
गिरफ्तार मजदूरों और कार्यकर्ताओं की बिना शर्त रिहाई
दर्ज किए गए सभी मुकदमों को वापस लेना
9 अप्रैल की घटना की निष्पक्ष न्यायिक जांच
ठेका प्रथा को समाप्त कर स्थायी नियुक्ति
न्यूनतम वेतन 30,000 रुपये प्रति माह लागू करना
महिला मजदूरों के लिए रात्रि शिफ्ट से संबंधित कानूनों में बदलाव
आगे क्या?
मामले ने अब राजनीतिक और सामाजिक बहस को जन्म दे दिया है। एक तरफ प्रशासन कानून-व्यवस्था बनाए रखने की बात कह रहा है, वहीं मजदूर संगठन इसे अपने अधिकारों की लड़ाई बता रहे हैं। आने वाले दिनों में यह आंदोलन और तेज हो सकता है, खासकर यदि मांगों पर कोई ठोस निर्णय नहीं लिया जाता।
